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नवरात्रि आठवां दिवस - उर्मिला: त्याग की प्रतिमूर्ति

महिमा तारे

नवरात्रि आठवां दिवस - उर्मिला: त्याग की प्रतिमूर्ति

रामायण प्रेम का ग्रंथ है। रामायण के रचियता वाल्मीकि ने रामकथा के तमाम पात्र एक गूढ भाव से जुड़े हैं वह है प्रेम। रामायण के पात्र इस प्रेम में ऐसे जुड़े है कि करीब से देखने पर आंखें नम हुए बिना नहीं रहती। बेटा पिता की इच्छा के लिए चौदह साल वन जाता है। एक भाई बड़े भाई के साथ जंगल जाता है तो दूसरा राज्य लेकर जंगल दौड़ता है। लक्ष्मण राम के प्रति ऐसे अनुराग से जुड़े हैं कि अपना स्वतंत्र अस्तित्व ही विलोपिता कर दिया यही स्थिति लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला की है वे लक्ष्मण से ऐसे प्रेम में है कि लक्ष्मण में आत्म समर्पित हो गई। रामायण हो या तुलसीदास रामचरित्र मानस लक्ष्मण उर्मिला संवाद है ही नहीं। राम के साथ लक्ष्मण ने जाने का निर्णय कर लिया तब वे माता से सिर्फ आज्ञा लेने जाते हैं। पत्नी उर्मिला के पास जाकर उन्होंने यह भी नहीं कहा कि वे जा रहे हैं। जब सिद्धार्थ यशोधरा को छोड़कर गए तब सुबह विलाप करते हुए यशोधरा कहती है सखी वे मुझसे कह कर जाते पर उर्मिला ने कही कोई रोष या शिकायत लक्ष्मण के प्रति प्रकट नहीं की।

कवियो और कलाकारों ने रामायण के सर्वार्धिक उपेक्षित पात्र के रूप में उर्मिला को बताया है। यह भी कहा जाता है कि रामायण के रचियता वाल्मीकि ने उर्मिला हो या मांडवी उन्हें गौण पात्र ही माना है। रामायण के कथा प्रवाह में इन पात्रों की जितनी भूमिका थी उन्होंने दिखाई है। इस दृष्टि से वाल्मीकि की दृष्टि से वह उपेक्षित पात्र नहीं है। इन पात्रों को उपेक्षित पात्र ललित साहित्य के रचनाकारों ने बनाया है। गुरू रविन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें काव्य की उपेक्षिता कहा है वहीं राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने स्त्री वेदना का भावपूर्ण वर्णन अपने महाकाव्य में किया है।

उर्मिला के चरित्र को देखे तो जहां प्रत्येक पात्र अपने -अपने धर्म का पालन कर रहा है राम पुत्र धर्म का, लक्ष्मण भ्रात धर्म का, सीता पति धर्म का वे अयोध्या में रहकर अपने परिवार धर्म का पालन करती हुई दिखायी देती है।

वे सीता की अनुपस्थिति में सम्पूर्ण पारिवारिक जिम्मेदारियां उठाती हंै। हम सब राम के चौदह वर्षों में हुई घटना के प्रति वो उत्सुक रहते हैं पर इन चौदह वर्षों में अयोध्या में क्या हुआ होगा इसको भूल जाते हैं। ऐसे समय में उर्मिला की जिम्मेदारियां कितनी बढ़ गई होंगी जहां घर में तीन वृद्ध सासें एक जेठानी जो खुद अकेली है भरत की पत्नी मांडवी। एक देवरानी यानी शत्रुघ्न की पत्नी। एक देवर जो अयोध्या के निकट नंदीग्राम में झोपड़ी बना कर रह रहा है वही अपनी सास कैकेयी की मन:स्थिति को भी संभालना है जो उनके खुद के निण्रय के चलते सबसे धिक्कारिकत हुई है और उपेक्षा सह रही है। कौशल्या की मन:स्थिति अलग है जिसका सुकुमार इकलौता पुत्र उन्हें छोड़कर वन चला गया। सुमित्रा भी पुत्र वियोग में दु:खी है ऐसे निराशाजनक वातावरण को परिवार से सामाजस्य बिठाने का भार उर्मिला ने ही वहन किया।

सीता के त्याग और उर्मिला के त्याग में अंतर है। सीता की तुलना में उर्मिला का त्याग अधिक है। पर इतिहास में भी उर्मिला के त्याग को सीता से कमतर आंका गया और उन्हें वह स्थान नहीं मिला जो मिलना चाहिए था। इतिहास जहां सीता को सम्पूर्ण नारी जाति के लिए आदर्श मानता हे वही उर्मिला को लेकर चुप हे। उर्मिला का त्याग संयम और समर्पण पर और अधिक चचा्र होनी चाहिए।

ऊपर हमने देखा कि राम सीता-लक्ष्मण के वन गमन के पश्चात वे ही परिवार का मुख्य आधार स्तम्भ थी। पर जो किवदंती प्रचलित है वह यह है कि वन में पहले रात निद्र देवी जब लक्ष्मण के पास आती है तो वे उसे अपनी पत्नी के पास भेजते हैं। ऐसा कहा जाता है कि चौदह वर्ष लक्ष्मण सोए ही नहीं जबकि उर्मिला चौदह वर्षों तक सोती रही। इसे उर्मिला निंद्रा के रूप में जाना जाता है। दक्षिण भारत में जहां कोई अधिक सोता है उसे इस तरह की किवदंती उर्मिला के चरित्र के साथ न्यान नहीं करती। उर्मिला का चौदह वर्ष का जागरण एक ऐसी तपस्या है जिसे समझना आसान नहीं है।

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