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नवरात्रि का छठवां दिवस : परिपक्वता का दूसरा नाम है देवी तारा

महिमा तारे

नवरात्रि का छठवां दिवस : परिपक्वता का दूसरा नाम है देवी तारा

तारा किष्किन्धा की महारानी। प्रात: स्मरणीय महिलाओं में से एक। अहिल्या, द्रौपदी, सीता, तारा, मंदोदरी तथा पंचकम् नाम स्मरे नित्यम् आयु: कामार्थ सिद्धये।

इन पांचों महिलाओं के नाम स्मरण मात्र से आयु की वृद्धि और मनोकामनाओं की सिद्धी होती है। पर हम में से कम ही लोग माता तारा के चरित्र को जानते हैं और आश्चर्य होता है कि ऐसा क्या है तारा के चरित्र में जो हमारे महान पूर्वजों ने उन्हें इतना सम्मान दिया है। हां हम सब वानर यूथपति और लंका के वैद्य सुषेण के नाम से अच्छी तरह परिचित है। यह सुषेण वैद्य वही है जिन्हें हनुमान लंका से इंद्रजीत के शक्ति बाण से मूर्छित लक्ष्मण के उपचार के लिए लेकर आए थे। तारा उन्हीं सुषेण वैद्य की पुत्री और किष्किंधा के राजा बाली की पत्नी है।

रामायण का हर एक नारी पात्र अपने आप में एक तेज लिए हुए है। चरित्र को निकट से देखने पर हम उससे प्रभावित और चमत्कृत हुए बिना नहीं रहते ऐसे ही दो-तीन प्रसंगों के माध्यम से हम तारा के प्रभावी व्यक्तित्व को समझ सकते हैं।

पहला- राम की मैत्री प्राप्त कर जब निर्वासित सुग्रीव बाली से द्वंद्व करता है और पराजित हो जाता है। राम से आकर आक्रोश प्रकट करता है कि आपने बाली पर बाण क्यों नहीं चलाया। तब राम कहते हैं कि दोनों में दैहिक साम्यता के कारण वे समझ नहीं पाए कि बाली कौन है? दूसरी बार ऐसा न हो इसलिए सुग्रीव विशेष प्रकार के फूलों की माला पहनकर तुरंत ही बाली को युद्ध के लिए ललकारने जाता है। इतनी शीघ्रता से आकर पुन: युद्ध के लिए ललकारने के कारण कुशाग्र बुद्धि तारा को तुरंत समझ में आ जाता है कि जिस शत्रु ने अभी-अभी मार खाई है वह तुरंत ही कैसे चुनौती दे सकता है। और वह बाली को बहुत समझाती है कि अवश्य ही सुग्रीव को राम का साथ मिल गया है। इसलिए बाली से युद्ध करने की वजाय संधि करना श्रेयस्कर है। पर हम सब जानते हैं कि पुन: युद्ध होता है और बाली राम के बाण से घायल होकर मृत्यु को प्राप्त होता है।

दूसरा बाली के मारे जाने के बाद जब किष्किंधा के सारे वानर भयभीत हो गए तब भी निर्भयता के साथ रणभूमि में पहुंच जाती है और पति की मृत देह के पास पहुंचकर विलाप करती है और राम से कहती है कि दूसरे के साथ युद्ध करते हुए बाली को मारकर आपने बहुत ही निंदनीय कार्य किया है। अंगद जैसे सौ पुत्रों की मां होने पर भी वह बाली के बिना नहीं रह सकती है और राम से एक बाण से अपने प्राण हर लेने के लिए प्रार्थना करती है। यहां पर पहली बार राम को हम तारा को ज्ञान देते हुए देखते हैं। वे तारा को समझाते हुए कहते हैं कि पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु इन पांच तत्वों से मिलकर यह शरीर रचा है जीव नित्य है तुम किसके लिए रो रही हो। यहां पर हमें दोनों का वार्तालाप कृष्ण अर्जुन संवाद जैसा लगता है। पूरी रामायण में हम राम के इस रूप को पहली बार देखते हैं। राम जिसे सीधे उपदेशित कर रहे हों वो नारी तो प्रात: स्मरणीय महिलाओं में ही होगी।

तीसरा- युद्ध खत्म हो गया राजा किसको बनाएं। सुग्रीव ने युद्ध जीता है। बाली के पुत्र युवा और वीर अंगद भी है तब तारा बड़ी राजनीतिक सूझबूझ का परिचय देते हुए कहती है राजा सुग्रीव होगा और अंगद युवराज बनेगा। इस निर्णय से वे गृहक्लेश को रोकती है।

चौथा- तारा की बुद्धिमत्ता, समझदारी और प्रंसगानुसार निर्णयात्मकता को हम तब देखते है जब बाली की मृत्यु होने के बाद सिंहासनारुढ़ हुए सुग्रीव ने वर्षा ऋतु समाप्त होने के बाद सीता की खोज का अभियान आरंभ करने में बिलंब किया तब रोष से भरे हुए राम का संदेश लेकर क्रोधित लक्ष्मण जब किष्किंधा में आए तो सुग्रीव भयभीत हो गए और लक्ष्मण का सामना करने की उसकी हिम्मत नहीं थीं तब उसने तारा को लक्ष्मण के सम्मुख यह कहकर भेज दिया कि महापुरूष कभी भी स्त्रियों के प्रति कठोर व्यवहार नहंी करते। तुम उनका सामना करो। तारा ने इसी मनोविज्ञान का लाभ उठाते हुए लक्ष्मण जी से संवाद किया और सुग्रीव की ओर से अपराध स्वीकार कर दया याचना भी की साथ ही ये भी कहा कि श्रेष्ठ पुरुष किसी हीन प्राणी पर क्रोध करते हैं तो उनका श्रेष्ठत्व निंदित होता है। इतनी सुंदर तार्किक बात सुनकर लक्ष्मण को केवल शाब्दिक रूप से शांत नहीं किया जा सकता था। इसलिए तारा ने यह भी बताया कि सुग्रीव ने इस बीच वानरों को लंका भेजकर शत्रु की शक्ति का समुचित अनुमान भी लगा लिया है। यह सब जानकारी नई नहीं थी। ये सारी जानकारी उसे बाली से पहले मिली हुई थी पर वह इस अवसर पर इसका उपयोग करती है।

हनुमान जी उन्हें विदुषी, सतीसाध्वी और विश्वविख्यात कह कर संबोधित करते हैं। स्पष्ट है देवी तारा भी एक अत्यंत आदरणीय पात्रों में से एक है। बुद्धिमत्ता, परिपक्वता एवं निर्णय लेने की असीम क्षमता उन्हें एक विशिष्ट स्थान देती है। नमन।

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