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नीति आयोग की नीति और राजनीति

- सुशील कुमार सिंह

भारत राज्यों का संघ है और बिना संघीय ढांचे को मजबूत किये टीम इण्डिया बनाने की सोच और न्यू इण्डिया की संकल्पना सम्भव नहीं है। जब 1 जनवरी, 2015 को योजना आयोग के स्थान पर थिंक टैंक नीति आयोग बनाने का प्रस्ताव मंत्रिमण्डल द्वारा जारी किया गया तब यह तय माना जा रहा था कि यह भारत सरकार को निर्देशात्मक एवं नीतिगत गतिशीलता प्रदान करेगा। कमोबेश यह अपने पद्चिन्हों पर चल भी रहा है पर यह आयोग सियासत से परे है पूरी तरह नहीं माना जा सकता। बीते 17 जून को नीति आयोग की ताजा बैठक में जहां एक तरफ कई मुख्यमंत्री प्रदेश और अपनी वित्तीय जरूरतों का रोना रोते रहे वहीं गैर एनडीए मुख्यमंत्रियों की ओर से अलग गुट बनाने और दिखाने का प्रयास भी चलता रहा। गौरतलब है कि यह बैठक 2022 तक न्यू इण्डिया बनाने के लिए जरूरी रणनीतिक दस्तावेज को लेकर बुलाई गयी थी। इसी बैठक में मनरेगा को किसानों के लिये फायदेमंद बनाने के लिये मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की गयी जिसमें बिहार, सिक्किम, गुजरात, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्रियों को शामिल किया गया। कमेटी को इस बात का परामर्श देना है कि मनरेगा का कृषि में कैसे बेहतर इस्तेमाल हो। प्रधानमंत्री मोदी ने नीति आयोग से राज्यों के साथ सामंजस्य बढ़ाने को कहा। इस पर राज्यों का यह भी आरोप है कि यह आयोग जो भी नीतियां बनाता है उसमें उनकी भागीदारी ज्यादा नहीं होती। हालांकि इसके बाद यह सहमति बनी है कि अब राज्यों के साथ ज्यादा बैठकों का दौर होगा ताकि आने वाली रूकावटों को हटाया जा सके।

इसमें कोई दुविधा नहीं कि बीते वर्षों के साथ सरकार का संस्थागत ढांचा विकसित और परिपक्व हुआ है। जिन उद्देश्य को लेकर नीति आयोग प्रकाश में आया था उस पर भी कदम आगे बढ़े हैं। इस आयोग ने लोगों के विकास के लिये, नीति बनाने के लिये एक प्रकार से सहकारी संघवाद को शामिल किया। जिसका तात्पर्य है कि केन्द्र के साथ राज्य भी योजनाओं को बनाने में अपनी राय रख सकेंगे। खास यह भी है कि इसके अन्तर्गत योजना निचले स्तर पर इकाइयों गांव, जिले, राज्य व केन्द्र के साथ आपसी बातचीत के बाद तैयार की जायेगी। साफ है कि नीति आयोग जमीनी वास्तविकता के आधार पर योजना चाहता है। प्रधानमंत्री मोदी ने बैठक के दौरान लोकसभा और विधानसभा चुनाव को एक साथ कराने के लिये व्यापक चर्चा का समर्थन किया। इससे उन्होंने देश का बहुत पैसा बचेगा की बात कही। इसमें कोई दो राय नहीं है कि गर्वनिंग काउंसिल ने देश के विकास के लिये ऐतिहासिक बदलाव का मन बनाया है परंतु यह तभी मूर्त रूप ले सकता है जब सरकारें टीम इण्डिया की तरह काम करें मगर पार्टी और राजनीति की गुटबाजी के चलते यहां खेमों में सरकारें बंटी रहती है हद तक खींचातानी का भी आंतरिक संदर्भ देखा जा सकता है। बिहार और आंध्र प्रदेश काफी समय से विशेष राज्य के दर्जे की बात कर रहे हैं। नीति आयोग की इस बैठक में भी एक बार फिर यह मांग दोनों प्रदेशों ने उठाई। यहां बता दें कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भाजपा के साथ मिलकर सरकार चला रहे हैं जबकि आन्ध्र प्रदेश की सत्ता चला रहे चन्द्रबाबू नायडू हाल ही में एनडीए को छोड़ चुके हैं जिसकी मुख्य वजह विशेष राज्य का दर्जा ही माना जाता है। जिस तरह के मौजूदा राजनीतिक परिप्रेक्ष्य उथल-पुथल की अवस्था में जा रहे हंै और नये गठबंधन और समीकरण विकसित करने के प्रयास हो रहे हैं उसे देखते हुए नीति आयोग के अंदर सियासी भंवर होने से इंकार नहीं किया जा सकता। जाहिर है 2019 के आम चुनाव होने तक नीति आयोग की कई बैठकें होंगी जिसमें बिछड़े और नये सियासी साथियों से कुछ भावनात्मक जुड़ाव का मौका भी मिलेगा।

नीति आयोग के गठन के बाद यह स्वाभाविक अपेक्षा थी कि जीडीपी ग्रोथ के साथ देश के समक्ष उत्पन्न चुनौतियों मसलन गरीबी, बेरोजगारी और महंगाई इत्यादि की समस्या के निराकरण हेतु राज्यों के साथ मिल बैठकर ऐसी नीतियां बनेंगी जिससे सहकारी संघवाद का स्वप्न भी पूरा होगा। चूंकि नीति आयोग एक थिंक टैंक है ऐसे में खुले मस्तिष्क के साथ इस मंच पर काम किया जा सकता है। मगर सियासी अनबन में क्या यह पूरी तरह सफल है, पड़ताल का विषय है। वैसे देश में हर चौथा व्यक्ति अभी भी गरीबी रेखा के नीचे है और इतने ही अशिक्षित हैं। देश में बेरोजगार युवाओं की भरमार है साथ ही सरकारी नौकरियों में भी कटौती का संदर्भ देखा जा सकता है। आर्थिक नीति और मुद्रा स्फीति पर नियंत्रण के अभाव में महंगाई भी जनता को दबाव में समय-समय पर लेती रहती है। गौरतलब है कि राज्यों की जरूरत की बात तो बाद में आती है, राजनीतिक घमासान को लेकर चिंतायें पहले नम्बर पर हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और केन्द्र के बीच बरसों से छत्तीस का आंकड़ा है। पश्चिम बंगाल समेत कर्नाटक, केरल और आन्ध्र प्रदेश के मुख्यमंत्रियों ने प्रधानमंत्री मोदी से आग्रह किया कि दिल्ली में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपराज्यपाल अनिल बैजल के साथ छिड़ी जंग समाप्त करायें। गौरतलब है कि ये सभी नीति आयोग की बैठक के एक दिन पहले केजरीवाल के घर पर थे। इसका सियासी अर्थ भी समझा जा सकता है और सांकेतिक विपक्षी एकता की ताकत के तौर पर भी पहचाना जा सकता है। सबके बाद समझना यह है कि जिस नीति आयोग को सहकारी संघवाद की तर्ज पर आगे बढ़ा रहे हैं क्या वे राज्यों के गुटों में विभाजन के चलते लक्ष्य पा पायेगा। गठबंधन समेत 22 राज्यों में एनडीए की सरकार चल रही है परन्तु जिन राज्यों में इनकी उपस्थिति नहीं है वहां की राजनीति से नीति आयोग शायद ही बेअसर हो। इतना ही नहीं बिहार के विशेष राज्य की मांग के चलते नीतीश कुमार भी राजनीतिक पेशोपेश में देखे जा सकते हैं।

विपक्ष का यह आरोप है कि अर्द्धसत्य, अतिश्योक्ति और छलावा नीति आयोग में प्रधानमंत्री के भाषण को परिभाषित करती है। दो करोड़ युवाओं को रोजगार देने के प्रधानमंत्री के वायदे को विपक्ष महा जुमला बता रहा है। मोदी ने चार साल पहले 26 मई को प्रधानमंत्री के रूप में पद संभाला और उसी साल 15 अगस्त को लाल किले से योजना आयोग की जगह नीति आयोग को लाने की बात कही जिसका मूर्त रूप 1 जनवरी, 2015 को देखने को मिला। नीति आयोग के पहले उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया पिछले साल अगस्त में त्यागपत्र देकर कोलम्बिया विश्वविद्यालय में पढ़ाने चले गये दरअसल वे वहीं से छुट्टी पर आये हुए थे तब से राजीव कुमार इस पद पर काबिज हैं। नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांसफॉर्मिंग के प्रथम अक्षर एनआईटीआई से बना नीति आयोग एक थिंक टैंक के तौर पर उम्मीदों को परवान चढ़ाने का काम किया। आर्थिक परिप्रेक्ष्य और दृष्टिकोण की मूल धारा क्या होती है इसे नीति आयोग के दायरे में ही आंका जा सकता है। हालांकि देश में समस्याओं के निराकरण को लेकर ठोस कदम उठे हैं पर पूरे नहीं पड़े हैं। इस आयोग के चलते राज्यों के मुख्यमंत्री और केन्द्रशासित प्रदेशों के उपराज्यपाल व मुख्यमंत्री एक प्लेटफॉर्म पर जुटते हैं हालांकि योजना आयोग को अन्तिम अनुमति देने वाली राष्ट्रीय विकास परिषद् में भी ये सभी सदस्य होते हैं। संगठनात्मक तौर पर नीति आयोग कई सम्भावनाओं की संस्था है। न्यू इण्डिया से लेकर डिजिटल इण्डिया और स्मार्ट सिटी से लेकर स्मार्ट गांव तक ही नहीं हर मर्ज की दवा और उसकी धारणा इसमें निहित है। परिसंघीय ढांचे से युक्त भारतीय संविधान का सहकारी संघवादी अवधारणा से भी यह ओत-प्रोत है मगर सियासी लोभ-लालच के चलते कुछ हद तक नीति आयोग भी राजनीतिक एकता और गुट मंच दिख रहा है जो कहीं से समुचित नहीं कहा जा सकता।

( लेखक वाईएस लोक प्रशासन शोध प्रतिष्ठान के निदेशक हैं )


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