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बिजली गिराकर जाने कहां चली गई वो हवा हवाई

दिवंगत श्रीदेवी मैडम तुसाद संग्रहालय लंदन में दुनिया के दूसरे सितारों के पुतलों के साथ शोभित होंगी...

बिजली गिराकर जाने कहां चली गई वो हवा हवाई

- विवेक कुमार पाठक

कुछ रोज पहले मैडम तुसाद संग्रहालय में हिन्दी सिनेमा की पहली महिला सुपरस्टार और दिवंगत लोकप्रिय अभिनेत्री श्रीदेवी का वैक्स स्टेच्यू मतलब मोम का पुतला स्थापित हुआ। उनका इस स्टैच्यू में हवा हवाई लुक है। हवा हवाई श्रीदेवी का कोई किरदार नहीं था बस इक फिल्मी गाने के बोलों से मिला नाम था। ये साल 1987 की बात है। वो सुपरहिट फिल्म थी मिस्टर इंडिया । शेखर कपूर निर्देशक थे। इस फिल्म से मौगेम्बो खुश हुआ कहने वाले खलनायक अमरीश पुरी को पहचाना जाता है तो हवा हवाई गाने के लिए चुलबुली श्रीदेवी को आज भी याद किया जाता है। खैर दिवंगत श्रीदेवी मैडम तुसाद संग्रहालय लंदन में दुनिया के दूसरे सितारों के पुतलों के साथ शोभित होंगी यकीनन वहां उन्हें देखते ही कहते हैं मुझको हवा हवाई के बोल प्रशंसकों के कानों में जरुर गूंजेंगे।

यूं बात निकली है तो आइए हिन्दी सिनेमा की पहली सुपरस्टार श्रीदेवी की कुछ और बात हो जाएं। कुछ दिनों पहले निरंतर लोकप्रिय हो रहीं बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत ने कहा कि वे आगे उन फिल्मों को करना चाहेंगी जो उनके दम पर चलें। खुलें शब्दों में कहें तो कंगना ने साफ कर दिया है कि उनकी पसंद की फिल्म वही होगी जिसमें वो नायक भले न हों मगर नायक से कम न हों। वे हिन्दी सिनेमा में महिला अधिकारों का झण्डा तेजी से ऊंचा कर रही हैं। यह बात चाहे तो कोई भी अभिनेत्री कह सकती है मगर कहने की ऐसी काबीलियत सबमें नहीं होती। असल में श्रीदेवी हिन्दी सिनेमा की ऐसी ही दमदार अभिनेत्री थीं जैसा कंगना बनना चाह रही हैं। आज भी उनकी फिल्में उनके हीरो से कहीं अधिक उनके नाम से याद की जाती हैं।

श्रीदेवी की चालबाज का ही जिक्र कर लें। डबल रोल में तब श्रीदेवी के साथ कौन कौन हीरो थे कितनों को याद होगा। दक्षिण सुपरस्टार रजनीकांत उनके साथ थे, सनी देयोल भी थे मगर क्या ये दोनों और उनके नाम से चालबाज चली थी, एकदम नहीं। चालबाज श्रीदेवी की फिल्म थी और श्रीदेवी की दमदार अदाकारी से ही चली। चांदनी में उन पर फिल्माया गया मेरे हाथों में नौ नौ चूडियां हैं गीत 90 के दशक से करोड़ों लोगों की यादों में सजा हुआ है। आज भी हमारे शादी ब्याह के महिला संगीतों में बेटियां और महिलाएं जब तब चांदनी जैसा नाचना नहीं भूलतीं।

श्रीदेवी की नगीना और निगाहें को कभी नहीं भुलाया जा सकता। मैं तेरी दुश्मन दुश्मन तू मेरा मैं नागिन तू सपेरा आज भी जोशीली बारातों की मनभावन धुन है। अनगिनत बारातों में क्या बच्चे, क्या युवा और क्या बुजुर्ग नागिन डांस में बीच सड़क पर रुमाल और साफी लेकर लोटपोट हो चुके हैं।

श्रीदेवी की प्रस्तुति हमेशा ही यादगार रही है। जुदाई की जान्हवी को कौन भूल सकता है। एक आम मध्यमवर्गीय महिला के सीमित लोभ लालच और अगर मगर वाले मानस को उन्होंने अपने किरदार से पर्दे पर साकार किया था। जुदाई में नयी आयीं उर्मिला मातोण्डर की जगह सीनीयर श्रीदेवी को ही इकतरफा पसंद किया गया। दरअसल ये सालों पुराने तजुर्बे और समर्पण भरे अभिनय की कामयाबी थी।

अमिताभ बच्चन अगर हिन्दी सिनेमा के महानायक कहलाने लगे तो श्रीदेवी महानायिका की दिशा में तेजी से बढ़ रहीं थीं। उनकी खासियत रही कि स्थापित होने के बाद अपनी तमाम फिल्मों की असल और इकलौती नायक वे ही रहीं। इंग्लिश विंग्लश की शशि और मॉम में देवकी बनकर उन्होंने यादगार जीवंत अभिनय किया। यूट्यूब पर नवराई माझी लाडाची लाडाची गं गीत को ही देख लीजिए। दुख के साथ लिखना पड़ रहा है कि इंग्लिश विगि्ंलश फिल्म में श्रीदेवी के इस जोशीले नृत्य के बाद उन्हें कभी पर्दे पर दुबारा नाचने का मौका नहीं मिला। वे निजी जीवन में एक बारात में नाचने के बाद अगले दिन की सुबह नहीं देख सकीं। ये अत्यंत दुख संताप देने वाला हादसा था जिसने हिन्दी सिनेमा से एक सुपरस्टार छीन लिया। वे बचपन से ही महान अदाकारा थीं। उनकी अभिनय यात्रा के कई मुकाम अभी बाकी थे मगर अचानक से उस अभागे दिन क्या हो गया। सचमुच आशाओं पर बिजली गिराकर सबको रुलाकर वो मिस हवाई हवाई जाने कहां चली गई।

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