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आईपीएस राजीव कुमार को हिरासत में लेकर पूछताछ करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला रखा सुरक्षित

आईपीएस राजीव कुमार को हिरासत में लेकर पूछताछ करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला रखा सुरक्षित

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल के आईपीएस अधिकारी राजीव कुमार को हिरासत में लेकर पूछताछ की सीबीआई की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है।

राजीव कुमार की ओर से वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि राजीव कुमार के बारे में जो कुछ भी कहा गया है, वह मनगढ़ंत है। 2015 में सरकार ने उन्हें उत्कृष्ट सेवाओं के लिए राष्ट्रपति पदक से सम्मानित किया और उसके बाद ऐसा क्या हुआ कि उनसे सीबीआई हिरासत में पूछताछ चाहती है?

इंदिरा जयसिंह ने कहा कि इस मामले में कोई आपराधिक इरादा नहीं है। इसके अलावा उन्हें इस मामले में पूर्ण रूप से उत्तरदायी नहीं बनाया जा सकता है। हिरासत में पूछताछ के लिए प्रार्थना को खारिज कर दिया जाना चाहिए। इंदिरा जयसिंह ने कहा कि सीबीआई ने 40 घंटे तक पूछताछ की है और अब उन्हें हिरासत में पूछताछ करने की आवश्यकता क्यों है? यह केवल मीडिया ट्रायल के लिए किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जब सीबीआई निदेशक ने एक हलफनामा दायर किया तो केवल विसंगतियों का आरोप लगाया गया था और उस आरोप के लिए ज्यादा से ज्यादा विभागीय जांच की जा सकती है। आप कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया को दरकिनार नहीं कर सकते और हिरासत में पूछताछ नहीं कर सकते।

इंदिरा जयसिंह ने कहा कि अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि उन पर क्या आरोप हैं और सीबीआई हिरासत में पूछताछ चाहती है। यदि सीबीआई साजिश का आरोप लगाती है तो कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया को अपनाया जाना चाहिए और विशिष्ट आरोप लगाने होंगे। उन्होंने कहा कि अगर कोई कथित साजिश है तो सीबीआई को एक पूरक आरोप पत्र दाखिल करना चाहिए। इस मामले में न तो आईओ और न ही अर्नब घोष से पूछताछ की गई है और यही कारण है कि उनके पास अपने आरोपों का समर्थन करने के लिए कोई सबूत नहीं है।

उन्होंने कहा कि इस मामले को उठाने का एकमात्र कारण यह है कि अगर पुलिस आयुक्त के साथ ऐसा हो सकता है तो मेरे साथ भी हो सकता है। अगर ऐसा है तो इस देश का नागरिक यहां कैसे सुरक्षित है। उन्होंने कहा कि देबजानी मुखर्जी के लैपटॉप और फोन की जानकारी लेना चाहते है, लेकिन मुख्य आरोपित सुदीप्तो सेन का फोन और लैपटॉप मालखाना ा हुआ है। सीबीआई इस बारे में पूछताछ नहीं कर रही है। उन्होंने कहा कि कोर्ट के पास अवमानना ​​कार्यवाही में हिरासत में पूछताछ के लिए आदेश देने का अधिकार नहीं है। यह मामला राजनीति से प्रेरित है। मुझे गिरफ्तार किया जा सकता है लेकिन कुणाल को नहीं, क्योंकि वह भाजपा में शामिल हो चुके हैं। इंदिरा जयसिंह की दलीलें खत्म होने के बाद सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मैं हिरासत में पूछताछ की मांग नहीं कर रहा हूं। मैं केवल कोर्ट से उनका प्रोटेक्शन आर्डर हटाने की मांग कर रहा हूं।

एक मई को सुनवाई के दौरान सीबीआई की ओर से तुषार ने राजीव कुमार के सारदा चिटफंट केस के सबूत नष्ट करने के सबूत दिए थे। राज्य सरकार के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने सीबीआई पर भाजपा के लिए काम करने का आरोप लगाया था।

सुनवाई के दौरान तुषार मेहता ने कोर्ट को उन प्रश्न और उत्तरों को सौंपा था जो राजीव कुमार और सारदा की निदेशक देबजानी मुखर्जी से पूछे गए थे। इस पर कोर्ट ने तुषार मेहता से पूछा था कि क्या ये साक्ष्य केस डायरी का हिस्सा थे तो तुषार मेहता ने कहा कि हां। तुषार मेहता ने कहा था कि जांच अधिकारी के बयान सही हैं और उन पर सवाल खड़े नहीं किए जा सकते हैं। जस्टिस संजीव खन्ना ने तुषार मेहता से कहा था कि अपराध प्रक्रिया संहिता में हुए संशोधन के मुताबिक केस डायरी एक साथ बंधे हुए होने चाहिए, अलग-अलग पन्नों में नहीं होने चाहिए।

मेहता ने कहा था कि जब सीबीआई ने विभिन्न अधिकारियों को नोटिस भेजना शुरू किया उन लोगों ने सीबीआई अधिकारियों के खिलाफ केस दर्ज करना शुरू कर दिया। एक याचिका में तो राज्य सरकार पक्षकार बन गई और हाईकोर्ट से अधिकारियों की सुरक्षा की मांग की। तब जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा था कि सीबीआई एक प्रीमियर एजेंसी है इसलिए उसे कानून का पूरा-पूरा पालन करना चाहिए। उन्होंने कहा था कि कई देश अपने यहां हिरासत में पूछताछ की अनुमति नहीं देते हैं। तब तुषार मेहता ने कहा था कि भारत का अपना अलग न्यायशास्त्र है। इस केस में साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ करने का मामला है जिसमें ताकतवर लोगों को बचाने की कोशिश हो रही है।

राज्य सरकार की ओर से पेश वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा था कि यह एक राजनीतिक मामला है ताकि मामले को गर्म बनाए रखा जा सके। ये मामला कई राज्यों से जुड़ा हुआ है इसलिए इसकी जांच सीबीआई को सौंपी गई। साक्ष्यों को मिटाने के मामले में कोई एफआईआर दर्ज नहीं कराई गई। सीबीआई कह रही है कि ये चार पांच साल पुराना मामला है । हम जांच में सहयोग कर रहे हैं तब हिरासत में पूछताछ की क्या जरूरत है। आज के पहले साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ का आरोप कभी नहीं लगाया गया। पुलिस आयुक्त के खिलाफ पहली बार आरोप एक भाजपा नेता ने अपने भाषण में लगाया। शिलांग में पुलिस अधिकारी से पांच दिनों में छत्तीस घंटे तक पूछताछ की गई।

सिंघवी ने कहा था कि मार्च महीने में सीबीआई निदेशक ने अपने हलफनामे में कहा था कि दस्तावेजों में गड़बड़ी है लेकिन साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ की बात नहीं कही।

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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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