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जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन के आसार

जम्मू-कश्मीर में शांति और विकास का एजेंडा लेकर पीडीपी के साथ गठबंधन करने वाली भाजपा को आखिरकार समर्थन वापसी का कड़ा फैसला लेना पड़ा।

गठबंधन से सभी दलों का इनकार

नई दिल्ली । जम्मू-कश्मीर में शांति और विकास का एजेंडा लेकर पीडीपी के साथ गठबंधन करने वाली भाजपा को आखिरकार समर्थन वापसी का कड़ा फैसला लेना पड़ा। पीडीपी के दबाव और शिवसेना जैसे सहयोगियों की आलोचना के बावजूद भाजपा ने गठबंधन धर्म निभाया, लेकिन महबूबा मुफ्ती की अलगाववादी शक्तियों के प्रति नरमी और आतंकवाद के खात्मे में पैदा की जाने वाली अड़चन ने भाजपा को यह कदम उठाने के लिए विवश कर दिया। कश्मीर में अब राज्यपाल शासन लगने का रास्ता साफ हो गया है, क्योंकि नेशनल कांफ्रेस, कांग्रेस ने समर्थन लेने और देने से मना कर दिया है। तीन साल पहले लम्बी जद्दोजहद के बाद पीडीपी-भाजपा के बीच समझौता हुआ था। पीडीपी को समर्थन देते समय भाजपा की तरफ से अपना एजेंडा स्पष्ट कर दिया गया था।

भाजपा द्वारा साफ कर दिया गया था, उसका उद्देश्य घाटी का विकास और आतंक का नाश करना है। इस दौरान केन्द्र सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर को हरसंभव मदद दी गई। सरकार की सारी योजनाओं को घाटी में सतह तक ले जाने का प्रयास किया गया, लेकिन पीडीपी समर्थन हासिल करने के बाद अपने कट्टरपंथी एजेंडे से अलग नहीं हो पाई। रमजान के दौरान केन्द्र ने शांति के मकसद से सेना का ऑपरेशन रूकवाया गया। लेकिन, बदले में शांति की जगह पर हिंसा बढ़ गई। तीन साल में लेह-लद्दाख, जम्मू और कश्मीर क्षेत्र के बीच नजदीकी लाने का हर प्रयास विफल किया गया।

मुफ्ती हालात को संभालने में नाकाम रहीं : राम माधव

भाजपा के महासचिव और जम्मू-कश्मीर के प्रभारी राम माधव ने कहा, हम खंडित जनादेश में साथ आए थे। लेकिन मौजूदा समय के आकलन के बाद इस सरकार को चलाना मुश्किल हो गया था। महबूबा मुफ्ती हालात संभालने में नाकाम साबित हुईं। हमनें एक एजेंडे के तहत सरकार बनाई थी। केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर सरकार की हर संभव मदद की। उन्होंने कहा कि हाल ही में वरिष्ठ पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या कर दी गई। राज्य में बोलने और प्रेस की आजादी पर खतरा पैदा हो गया था। उन्होंने कहा भाजपा के लिये जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, लेकिन आज जो स्थिति है उस पर नियंत्रण करने के लिए हमने फैसला किया है कि राज्य में राज्यपाल शासन लाया जाए। घाटी में शांति स्थापित करना हमारा एजेंडा था और रहेगा।

सत्ता नहीं, मकसद के लिए बनाई थी सरकार : महबूबा

मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद मंगलवार को श्रीनगर में पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती ने प्रेस वार्ता कर अपनी बात रखी। महबूबा मुफ्ती ने कहा कि मुफ्ती साहब ने बड़े दृष्टिकोण के लिए भाजपा के साथ गठबंधन किया था। उन्होंने कहा, मैं भाजपा के इस फैसले से अचंभित नहीं हूं। हमने सत्ता के लिए गठबंधन नहीं किया था। इस गठबंधन के कई बड़े मकसद थे। उन्होंने बताया है कि हम किसी गठबंधन की तरफ नहीं बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा, एक बात तो साफ है कि जम्मू-कश्मीर में सख्ती की नीति नहीं चल सकती है। यह समझना होगा कि जम्मू-कश्मीर दुश्मनों का क्षेत्र नहीं है। हमने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को साथ रखने की कोशिश की।

राज्यपाल ने राष्ट्रपति को भेजी रिपोर्ट

राज्यपाल एनएन वोहरा ने राज्य की सभी बड़ी पार्टियों से चर्चा के बाद अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को भेज दी है। राज्यपाल ने रिपोर्ट के साथ ही सेक्शन 92 (जम्मू-कश्मीर के संविधान) के तहत राज्य में राज्यपाल शासन की मांग की है। नैशनल कॉन्फ्रेंस नेता उमर अब्दुल्ला ने राज्यपाल से मुलाकात की और नए सिरे से चुनाव की मांग की। उमर अब्दुल्ला ने यह भी स्पष्ट किया कि वह किसी भी प्रकार के गठबंधन से सरकार बनाने की कोशिश नहीं करेंगे। वहीं कांग्रेस के समर्थन की अटकलों के बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस किसी भी कीमत पर पीडीपी को समर्थन नहीं देने वाली है। ऐसी स्थिति में एक ही रास्ता बचता है कि फिलहाल राज्य में राज्यपाल शासन लगा दिया जाए और नए सिरे से विधानसभा चुनाव कराए जाएं।

जम्मू कश्मीर विधानसभा में सीटों की स्थिति

पीडीपी - 28

भाजपा - 25

नेशनल कॉन्फे्रंस - 15कांग्रेस - 12

अन्य - 07

कुल सीटें - 87

दो दिन पहले ही तैयार हो गई थी रणनीति

नई दिल्ली । जम्मू-कश्मीर सरकार से समर्थन वापसी को लेकर काफी समय से माथापच्ची चल रही थी। मई में जब निर्मल सिंह को उपमुख्यमंत्री की जगह विधानसभा अध्यक्ष बनाया गया, तब किसी को अंदाजा नहीं था कि इस फेरबदल के पीछे रणनीति क्या है। भाजपा द्वारा पीडीपी की हर शर्त को माना गया, लेकिन आतंकवाद के मुद्दे पर पीडीपी की तरफ से लगातार असहयोग और गुप्तचर एजेंसियों की रिपोर्ट के बाद घाटी के मसले पर शनिवार को भाजपा ने बड़ा फैसला ले डाला। सूत्र बताते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निवास पर शनिवार को भाजपा के वरिष्ठ नेताओं तथा केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की मौजूदगी में जो मंत्रणा बैठक हुई, उसमें समर्थन वापसी का निर्णय ले लिया गया था।

पार्टी की तरफ से इसकी भनक किसी को नहीं लगने दी गई, क्योंकि उससे राजनीतिक नुकसान हो सकता था। सोमवार को जम्मू-कश्मीर के सभी वरिष्ठ नेताओं को दिल्ली तलब किया गया। उन्हें भी इतना बड़ा कदम उठाने की जानकारी नहीं थी। सुबह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से करीब आधा घंटे की गुप्त बैठक के बाद घाटी के सभी नेताओं के साथ शाह बैठक करते हैं और उनका मंतव्य जानने के बाद समर्थन वापसी का निर्णय सुनाया जाता है। सूत्र बताते हैं कि जम्मू-कश्मीर प्रभारी राममाधव को भी मंगलवार को समर्थन वापसी के फैसले का पता चला। बैठक के तत्काल बाद पत्रकारवार्ता बुलाकर इसका ऐलान कर दिया जाता है। सूत्र बताते हैं कि पिछले छह माह से जम्मू-कश्मीर के हालात का भाजपा के नेता अवलोकन करने में लगे हुए थे।

वहां सबसे बड़ी दिक्कत पत्थरबाजी की बढ़ रही घटनाएं और जम्मू-कश्मीर के लोगों से बढ़ रही दूरी आ रही थी। भाजपा हर हाल में कश्मीर घाटी में जम्मू से श्रीनगर तक और लेह-लद्दाख तक के लोगों के मन में एकता देखना चाहती है। इसलिए भाजपा की तरफ से लगातार इस राज्य सरकार के स्तर पर स्थानीय लोगों के बीच विश्वास पैदा करने की कोशिश की गई, लेकिन इसके बावजूद दहशतगर्दी की घटनाओं में रोक नहीं लग पाने के कारण संघ को सरकार की बजाय सड़क पर रहकर सुधार के कार्य को आगे बढ़ाना उचित लगा।




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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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