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बिहार में कई जिलों में सूखे की स्थिति तो कुछ में बाढ़ जैसे हालात, पढ़े पूरी खबर

बिहार में कई जिलों में सूखे की स्थिति तो कुछ में बाढ़ जैसे हालात, पढ़े पूरी खबर

पटना। बिहार के 13 जिले बाढ़ से प्रभावित हैं, लेकिन 16 जिलों में बारिश के पानी के कारण ग्रामीण सड़कें पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई हैं। इसके अलावा चार-पांच जिले ऐसे हैं जहां की ग्रामीण सड़कें आशंकि रूप से क्षतिग्रस्त हुई हैं। पूरे राज्य में 2679 ग्रामीण सड़कें व 26 पुल क्षतिग्रस्त हुए हैं। हालांकि पानी उतरने के बाद 500 सड़कों पर यातायात बहाल कर दिया गया है।

पिछले 10 वर्षों में बाढ़ के पानी से सबसे ज्यादा ग्रामीण सड़कें क्षतिग्रस्त हुई हैं। वर्ष 2017 में करीब तीन हजार ग्रामीण सड़कें क्षतिग्रस्त हुई थीं। कटिहार, दरभंगा, किशनगंज, पूर्वी चम्पारण, पूर्णिया, मुजफ्फरपुर, अररिया, मधुबनी व पश्चिम चम्पारण जिले में सड़कें क्षतिग्रस्त हुई हैं। हालांकि जिलों से पूरी रिपोर्ट आनी अभी बाकी है। विभाग के अधिकारियों का कहना है कि क्षतिग्रस्त सड़कों की संख्या बढ़ सकती है। कई सड़कें ऐसी हैं जो हाल में बनी थीं और बाढ़ में बह गईं। इन सड़कों का निर्माण नए सिरे से करना होगा।

सहरसा में 36, सुपौल में 95, कटिहार में 230, किशनगंज में 220, अररिया में 294, सीतामढ़ी में 257, शिवहर में 430, पूर्वीचम्पारण में 375, पश्चिम चम्पारण में 105, दरभंगा में 258, मधुबनी में 458, खगड़िया में 17, मुजफ्फरपुर में 73, पूर्णिया में 213, मधेपुरा में 17 व समस्तीपुर में 31 ग्रामीण सड़कें क्षतिग्रस्त हुई हैं।

एक किलोमीटर क्षतिग्रस्त सड़क की मरम्मत पर करीब 40 लाख खर्च होंगे। पानी घटने के बाद क्षतिग्रस्त सड़कें व पुल-पुलिया के निर्माण के लिए डीपीआर बनाने का आदेश संबंधित जिले के कार्यपालक अभियंताओं को दिया जाएगा। ग्रामीण कार्य विभाग क्षतिग्रस्त सड़कों की जिलावार सूची आपदा प्रबंधन विभाग को सौंपेगी। यह सूची केंद्र सरकार को भेजी जाएगी। केन्द्र सरकार पर निर्भर है कि वह क्षतिग्रस्त सड़कों की मरम्मत के लिए राशि कब स्वीकृत करती है।

जलवायु परिवर्तन से वर्षा चक्र तेजी से बदल रहा है। इससे उत्तराखंड भी अछूता नहीं है। पेड़ों के कटान, वाहनों की तादाद में बेतहाशा वृद्धि और इलेक्ट्रॉनिक अप्लाइंसेस के ज्यादा इस्तेमाल से वायुमंडल में पड़ने वाले असर के चलते वर्षा चक्र निरंतर गड़बड़ा रहा है। मौजूदा मानसून में ही कभी मूसलधार बारिश तो कभी कुछ सूखे जैसे हालात, जलवायु परिवर्तन के बड़े संकेत हैं।

आबादी के साथ-साथ वाहनों की संख्या में भी वृद्धि हो रही है और तेजी से हो रहे औद्योगिकीकरण से हो रहे गैसों के उत्सर्जन ने वायुमंडल पर असर डाला है। इससे वर्षा चक्र अनियमित हो रहा है। नतीजतन कभी सूखा, कभी अत्यधिक बारिश, बाढ़ के हालात, चक्रवात आदि की प्राकृतिक घटनाएं सामने आ रही हैं। पिछले पांच सालों में मानसून काल में नैनीताल जिले में जून-जुलाई की औसत बारिश 610 मिमी. है। साल 2018 में यह 60 मिमी.की कमी के साथ 450 मिमी. हुई। साल 2017 में ये आंकड़ा अधिक रहा। साल 2015 में भी यहां औसत बारिश से कम बारिश दर्ज हुई। इसी तरह बीते दिनों मानसून सीजन में एक तरफ कुछ घंटों में 100 मिमी.से अधिक बारिश एक ही बार हो गई, वहीं कुछ दिन सूखा मौसम होने से पारे में उछाल आ गया। जलवायु परिवर्तन के कारण ही यह अनियमित वर्षा चक्र सामने आ रहा है।

यह स्ट्रीम इवेंट है, जो जलवायु परिवर्तन के कारण पैदा होता है। स्टीम इवेंट में कुछ ही समय में अत्यधिक बारिश होती या फिर सूखे जैसे हालात भी हो जाते हैं। यह 30 सालों में एक या दो बार ही देखा जाता था, लेकिन अब बीते 10-15 सालों में चार-पांच बार ऐसा मौसम देखा गया है। यह जलवायु परिवर्तन का ही कारण है।

बीते पांच सालों में नैनीताल जिले की बारिश (मिमी में)

2018 450

2017 655

2016 715

2015 497

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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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