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विकास का रास्ता है एक देश, एक चुनाव

विकास का रास्ता है एक देश, एक चुनाव

देश में लम्बे समय से एक देश एक चुनाव पर मंथन चल रहा है। अब भी इस दिशा में आगे बढ़ने का निरंतर प्रयास किया जा रहा है। इसको लेकर समर्थन और विरोध दोनों प्रकार की स्थिति दिखाई दे रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा इस मुद्दे पर बुधवार को बुलाई गई बैठक में लगभग 24 दलों ने एक साथ चुनाव कराने पर सहमति जताई। उनका मानना है कि एक साथ चुनाव संपन्न हो जाने से विकास की गति को रफ्तार मिलेगी। बैठक में एनडीए के घटक दलों के अलावा एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी, माकपा के सीताराम येचुरी और सुधाकर रेड्डी के साथ भाकपा के डी राजा, जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती, नेशनल कान्फ्रेंस के नेता फारूख अब्दुल्ला, बीजू जनता दल के अध्यक्ष और ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार भी पहुंचे। सरकार की तरफ से नरेंद्र सिंह तोमर, राजनाथ सिंह, अमित शाह, थावरचंद गहलोत, राम विलास पासवान शामिल हुए। हालांकि कुछ विपक्षी राजनीतिक दल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा बुलाई गई बैठक में भाग लेने का मन नहीं बना पाए। उनमें कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, सपा, बसपा और राजद समेत करीब 18 दल शामिल हैं। हालांकि एक देश एक चुनाव कोई अनूठा प्रयोग नहीं कहा जा सकता, क्योंकि देश में ऐसा पहले भी हो चुका है। 1952, 1957, 1962, 1967 में जो चुनाव हुए वह लोकसभा और विधानसभाओं के एक साथ ही हुए। लेकिन यह क्रम उस समय भंजित हो गया, जब 1968 में कुछ राज्यों की विधानसभाओं को केन्द्र सरकार ने भंग कर दिया था। अब जब देश में एक साथ चुनाव कराए जाने की बात उठ रही है तो इसमें कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। यह प्रयास देश को विकास की गति देने में सकारात्मक मार्ग बनाने में सहायक होगा।

वर्तमान में ऐसे कई कारण हैं जो राष्ट्रीय विकास में बाधक बन रहे हैं। उनमें से एक, बार-बार होने वाले चुनाव भी हैं। देश में होने वाले चुनावों के दौरान लगने वाली आचार संहिता के चलते सरकार का कामकाज भी प्रभावित होता है। यहां एक बात यह भी उल्लेखनीय है कि प्रत्येक वर्ष देश के किसी न किसी हिस्से में चुनाव होते ही रहते हैं, जिसके कारण राजनीतिक दल केवल हर साल केवल चुनाव जीतने की योजना ही बनाते रहते हैं। इस कारण सरकारों को देश या प्रदेश के उत्थान के बारे में योजना बनाने या सोचने का समय नहीं मिल पाता। इसलिए वर्तमान में जिस प्रकार से एक साथ चुनाव कराने की योजना पर मंथन चल रहा है, वह देश को उत्थान के मार्ग पर ले जाने का एक अभूतपूर्व कदम है। जो देश के विकास का रास्ता तैयार करेगा।

यह बात भी सही है कि बार-बार होने वाले चुनावों से विकास में बाधा आती है। ऐसे में देश के सभी राजनीतिक दलों को एक साथ चुनाव कराने के बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए। सच कहा जाए तो एक साथ चुनाव कराया जाना राष्ट्रीय चिंता का विषय है, जिसे सभी दलों को सकारात्मक दृष्टि से लेना होगा। इसके कारण देश में सरकारी कामकाज की प्रक्रिया तो बाधित होती ही है। साथ ही सरकारी कामकाज को लेकर सक्रिय रहने वाले सरकारी अधिकारी और आम जनता भी ऐसी बाधाओं के चलते निष्क्रियता के आवरण को ओढ़ लेते हैं। यह भी काम में रुकावट का कारण बनती है। इन सभी कारणों के निदान के लिए देश में एक साथ चुनाव कराने के विषय पर सभी राजनीतिक दलों के बीच संवाद बढ़ना चाहिए और इस बारे में आम सहमति बनायी जानी चाहिए।

सरकार की मंशा स्पष्ट है, लेकिन विपक्षी राजनीतिक दल इस बारे में क्या राय रखते हैं, यह अभी तक पूरी तरह से सामने नहीं आ पाया है। देखने में आ रहा है कि कई दल केवल विरोध करने के लिए ही विरोध कर रहे हैं। उनके पास इस विरोध का वाजिब तर्क भी नहीं है। एक साथ चुनाव होने से देश में विकास की गति को समुचित दिशा मिलेगी, जो बहुत ही आवश्यक है। इसके अलावा देश में बार-बार चुनाव होने से देश को आर्थिक बोझ भी झेलना पड़ता है। एक साथ चुनाव कराना कोई कठिन कार्य नहीं हैं। फिलहाल दुनिया के 10 देशों ने भी इस प्रकार की नीतियां बनाई हैं, जिसके अंतर्गत एक साथ चुनाव कराए जाते हैं। कहना न होगा कि वे देश विकास के पथ पर निरंतर रुप से आगे बढ़ते जा रहे हैं। जब ऐसा विदेशों में हो रहा है और भारत में भी ऐसा होता रहा है, तब अब भारत दोबारा ऐसा क्यों नहीं कर सकता?

अगर देश में लोकसभा और राज्यों के चुनाव एक साथ होने पर राजनीतिक दलों की सहमति बनती है तो इससे आम जनता को राहत ही मिलेगी। लेकिन विरोध की राजनीति करने वाले राजनीतिक दल इस पर क्या कहेंगे? हालांकि देश में जनहित के साथ ही राष्ट्रीय हितों के प्रति सबको समर्थन देना ही चाहिए, क्योंकि राष्ट्रीय हित से बड़ा कुछ हो ही नहीं सकता। सभी चाहते हैं कि राष्ट्रीय प्रगति हो। इसके लिए अच्छे कदमों का स्वागत किया जाना चाहिए।

यदि देश में एक ही बार में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं का चुनाव कराया जाए तो आदर्श आचार संहिता कुछ ही समय तक लागू रहेगी। उसके बाद विकास कार्यों को निर्बाध पूरा किया जा सकेगा। 'एक देश, एक चुनाव' के कारण काले धन और भ्रष्टाचार पर रोक लगाने में मदद मिलेगी। यह किसी से छिपा नहीं है कि चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों द्वारा काले धन का खुलकर इस्तेमाल किया जाता है। एक साथ चुनाव कराने से सरकारी कर्मचारियों और सुरक्षा बलों को बार-बार चुनावी ड्यूटी पर लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। विधि आयोग भी इसके पक्ष में है। हालांकि चुनाव आयोग अभी इस बारे में संसाधनों और मैन पावर में कमी के कारण अपना मन नहीं बना पाया है। लेकिन अगर ऐसा तय हो जाता है तो उसे भी कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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सुरेश हिंदुस्तानी ( 0 )

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