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चुनाव विशेष : सात दशक की चुनावी खर्च यात्रा

सुशील कुमार सिंह

चुनाव विशेष : सात दशक की चुनावी खर्च यात्राFile Photo

लोकसभा चुनाव 2019 का बिगुल बीते 10 मार्च को बज गया है और सभी दल सत्ता की दौड़ में शामिल हो गये हैं पर शायद ही किसी को ध्यान हो कि लोकतंत्र के इस महोत्सव में बहुत बड़े आर्थिक हिस्से की भी आहुति हो जाती है। अनुमान है कि इस बार 71 हजार करोड़ रूपए से अधिक का खर्च लोकसभा के गठन में आयेगा जो 2014 की तुलना में ठीक दोगुना है। अमेरिका स्थित एक चुनाव विशेषज्ञ पर दृष्टि डालें तो उनका मानना है कि भारत के इतिहास में और दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक देश के सबसे खर्चीले चुनाव में से 2019 का चुनाव होगा। सेंटर फॉर मीडिया स्टडी का अध्ययन करें तो पता चलता है कि 1996 में लोकसभा के चुनाव में 25 सौ करोड़ रूपए खर्च हुए थे। साल 2009 में यह रकम चार गुना बढ़कर 10 हजार करोड़ हो गयी। हालांकि इसमें वोटरों को गैर कानूनी तरीके से दिया गया कैश भी शामिल है। दो दशक के भीतर अब यह सात गुने से अधिक का खर्च बन गया है जो 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव का ठीक डेढ़ गुना है। यह हर चुनाव में देखा गया है कि राजनीतिक दल चुनाव आयोग द्वारा नियम संगत ठहराये गये खर्च से कई गुना धन व्यय करते हैं। तमाम निगरानी के बावजूद ईमानदारी हमेशा इस मामले में खतरे में रहती है। यह चुनाव आयोग भी शायद जानता है और देश के सभी सियासतदान तो इसमें शामिल ही होते हैं। अनाप-षनाप धन के व्यय से जहां देष की आर्थिक हालत पतली होती है वहीं ईमानदार और कर्मठ व्यक्ति के लिए चुनाव लडऩा मुश्किल हो जाता है। फलस्वरूप लोकतंत्र में ऐसे लोगों का समावेश रिक्त रह जाता है। यह महज़ आंकड़ा नहीं बल्कि भारत की वह असल तस्वीर है जिससे शायद ही कोई अनभिज्ञ हो कि जिस भारत में लोकतंत्र इतना महंगा हो जाये उसी भारत में हर चौथा व्यक्ति अशिक्षित और इतने ही गरीबी रेखा के नीचे हैं। किसानों का देश है पर प्रतिवर्ष 12 हजार की दर से आत्महत्या हो रही हैं। पिछले चार दशक की तुलना में बेरोजगारी सबसे बड़े आंकड़े के साथ बढ़त बनाये हुए है और बेरोजगार युवा कॅरियर और लाइफ मैनेजमेंट के मामले में कहीं अधिक फिसड्डी सिद्ध हो रहे हैं। इन्हीं समस्याओं को दूर करने के लिए ही राजनीतिक दल चुनावी समर में तरह-तरह के वायदे करते हैं और बाद में इन्हीं समस्याओं के साथ लोगों को छोड़ भी देते हैं और स्वयं आगे बढ़ जाते हैं। इन्हीं पीछे छूटे लोगों से फिर से नये चुनावी वायदों और नई उ मीदों का सिलसिला दशकों से चल रहा है।

लोकसभा के चुनावी खर्च पर एक दृष्टि डाली जाये तो पिछले सात दशकों में 16 बार हो चुके चुनाव में खर्च दर तेजी से बढ़त लिये हुए है। इतना ही नहीं चुनाव लडऩे वाले उ मीदवारों की सं या में भी तुलनात्मक बढ़ोत्तरी व्यापक पैमाने पर हुई है। पहले लोकसभा चुनाव में करीब 10 करोड़ रूपए खर्च हुए थे। सरकारी आंकड़ा बताता है कि 1952 से 1971 के बीच 5 लोकसभा चुनाव में चुनावी खर्च 10 करोड़ 45 लाख रूपये से शुरू होकर महज 11 करोड़ 60 लाख तक ही होते थे। लेकिन उसके बाद खर्च में बेतहाशा वृद्धि होने लगी। 1977 के चुनाव में यह खर्च 23 करोड़ था वहीं 3 साल बाद 1980 में 7वीं लोकसभा के गठन में 54 करोड़ रूपए खर्च हुए। 1984 में 81 करोड़ चुनावी खर्च आया, 1989 के चुनाव में यह खर्च डेढ़ अरब रूपए हो गया। 1991 में चुनाव साढ़े तीन अरब का और 1996 का चुनाव 6 अरब के साथ दोगुना हो गया। 1999 में खर्च 9 अरब रूपए के आस-पास हुआ जबकि 2004 में कुल चुनावी खर्च 13 अरब रूपए था। मौजूदा समय में यह चुनावी खर्च देश के एक माह की जीएसटी के आस-पास प्रतीत होता है। चुनाव में होने वाले खर्च में ज्यादातर हिस्सा काले धन का होता है जो हवाला, कॉरपोरेट संस्थानों के जरिये सियासी दलों को मिलता है। राजनीतिक दल इस रकम का प्रयोग स्वयं के खर्च में और मतदाताओं को प्रलोभन मसलन नकद राशि देने, शराब पिलाने आदि में करते हैं। इसके अलावा चुनाव प्रचार की सामग्रियां आदि पर भी व्यापक पैमाने पर खर्च किया जाता है। बेतहाशा खर्च पर क्या रोक संभव है। शायद इस सवाल का जवाब नहीं मिल पायेगा। चुनाव में काले धन की बारिश आम बात है यदि कुछ हो सकता है तो पारदर्शिता ही इसमें लगाम लगा सकती है और इसका जि मा भी इन्हीं राजनीतिक दलों का है जो चुनाव जीतकर व्यवस्थापिका की हैसियत से कानून निर्माता होते हैं। गौरतलब है कि आय कर अधिनियम की धारा 13 के अधीन राजनीतिक दलों को जो चंदा मिलता है उसे आयकर से छूट मिली हुई है। इतना ही नहीं यह पता लगाना भी मुश्किल है कि दलों को धन कहां से कितना प्राप्त होता है क्योंकि यह सूचना के अधिकार में शामिल नहीं है।

कोई भी उ मीदवार धन-बल के बूते लोकसभा चुनाव नहीं जीत पायेगा ऐसी उ मीद हर बार जगती है पर ऐसा होता नहीं है। गौरतलब है कि भारत का निर्वाचन आयोग उ मीदवारों के चुनावी खर्च पर कड़ा पहरा लगाता है पर सफल कितना है कह पाना कठिन है। गौरतलब है कि चुनाव में कोई भी उ मीदवार 70 लाख से अधिक खर्च नहीं कर सकता लेकिन पार्टियों के खर्च की कोई सीमा नहीं है। केन्द्रीय नेताओं की हवाई यात्राओं और विज्ञापन का खर्च पार्टी उठाती है। पार्टियां सबसे ज्यादा खर्च विज्ञापन और हवाई यात्रा पर ही करती हैं। आंकड़े बताते हैं कि हेलीकॉप्टर का किराया 2 लाख रूपए प्रति घण्टा तक है। जबकि हवाई जहाज का किराया इतने ही समय के लिए साढ़े तीन लाख रूपए का है। इस औसत से एक जहाज का किराया ही 16 लाख प्रतिदिन हो जाता है। लोकसभा चुनाव में 125 से 130 हवाई जहाज और हेलीकॉप्टर के उड़ान की स भावना व्यक्त की गयी है और यह सिलसिला डेढ़ से दो महीने तक लगातार चलता रहता है। मतदाताओं को रिझाने के लिए प्रचार माध्यमों टीवी, रेडियो, अखबार, इंटरनेट आदि के जरिये भी बड़ी तादाद में रूपया खर्च किया जाता है। झण्डे, बैनर से लेकर रैली के लिए कुर्सी, टेन्ट आदि खर्च के अलावा कार्यकर्ताओं के खाने-पीने पर लाखों-करोड़ों व्यय किया जाता रहा है जिसमें व्यापक पैमाने पर धन का कोई हिसाब-किताब नहीं मिलता और चुनाव आयोग के पास खर्च कुछ और हिसाब कुछ पहुंचाया जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो हवाला और काला धन की खपत भी चुनावी महोत्सव में होते हैं। सेंटर मीडिया स्टडी की रिपोर्ट यह भी बताती है कि राजनीतिक दल कम और उ मीदवार अधिक धन खर्च कर रहे हैं। बढ़ता खर्च यह इशारा कर रहा है कि देश में लोकतंत्र को सुसज्जित करने की फिराक में विकासशील भारत को ही नजरअंदाज किया जा रहा है। 1951 के चुनाव में लोकतंत्र को गढऩे में प्रति वोटर 60 पैसे खर्च आया। 2009 में यही 12 रूपए प्रति मतदाता हो गया। 2014 में बढ़कर 17 रूपए हो गया। जाहिर है 2019 में प्रति मतदाता चुनाव खर्च बढ़ा हुआ मिलेगा।

जब उ मीदवार चुनाव जीतकर मननीय हो जाता है तब भी उस पर देश का अच्छा खासा रूपया व्यय होता है। वेतन भत्ता, कार्यालय खर्च, सचिवालयी सहायता के रूप में राशि, निर्वाचन क्षेत्र भत्ता आदि के अलावा सांसदों को साल भर में 34 हवाई यात्राओं और असीमित रेल और सड़क यात्रा के लिए सरकारी खजाने से ही धन दिया जाता है। संसद चलाने में भी प्रति मिनट करीब 3 लाख रूपए का खर्च आता है। चुनाव से लेकर संसद बनने और उसके बाद संसदीय कार्यवाही समेत सभी संदर्भों को जोड़ा जाय तो देश का बहुत बड़ा हिस्सा लोकतंत्र को चुनने से लेकर सुसज्जित करने में खर्च हो जाता है। ऐसे में यह जरूरी है कि देश के नागरिकों के मत और उनकी गाढ़ी कमाई से चल रही व्यवस्था में उनका विकास ईमानदारी से होना चाहिए।

(लेखक वाईएस लोक प्रशासन शोध प्रतिष्ठान के निदेशक हैं)

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