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नीली क्रांति मानवता के लिए कहीं अभिशाप न बन जाए

मैने कई लोगों को यह सुझाव देते हुए सुना है कि मछली लाल मांस तथा चिकन की तुलना में अधिक स्वस्थकर भोजन है।

नीली क्रांति मानवता के लिए कहीं अभिशाप न बन जाए

मैने कई लोगों को यह सुझाव देते हुए सुना है कि मछली लाल मांस तथा चिकन की तुलना में अधिक स्वस्थकर भोजन है। शाकाहारियों को मछली तथा समुद्री भोजन की ओर रुख करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। कुछ समय पहले मैंने एक चार्ट प्रकाशित किया था जिसमें यह दर्शाया गया था कि कैलोरी दर कैलोरी हिसाब से मछली मांस से भारी थी और इसका वसा तत्व भी अधिक था। इसमें कीटनाशक, पीसीबी (जो सभी रसायनों में सर्वाधिक कैंसर कारक हैं) और मानव मल तत्व भी अधिक था (भारतीय समुद्र विज्ञान संस्थान द्वारा दर्शाए गए अनुसार)।

भारत में मछली उत्पादन में 11 गुना वृद्धि हुई है। हम चीन के त्र्शर्ष्क्क िंसंसार में दूसरे सबसे बड़े मछली उत्पादक बन गए हैं। वर्ष 2015-16 में हमारे देश में अनुमानत: 10.4 मिलियन टन मछली का उत्पादन किया गया था जो विश्व के कुल उत्पादन का लगभग 6.5 प्रतिशत होता है। भारत मछली का सबसे बड़ा निर्यातक है और मछली तथा संबंधित उत्पादों का हमारा निर्यात वर्ष में 14 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ रहा है - जो अन्य देशों की वृद्धि की तुलना में दुगना है। नीली क्रांति की सरकारी नीति से प्रोत्साहित होकर मछली फार्म देश के सभी हिस्सों में पनप रहे हैं, यह फार्म किस प्रकार कार्य करते हैं? उनके पास कोई पशु चिकित्सक नहीं होता, गांव के लिए कोई प्रशिक्षण प्रणाली मौजूद नहीं है जो अपने सामुदायिक तालाबों को निजी रूप से प्रबंधन किए जाने वाले मछली फार्मों में बदल रहे हैं। तालाब दिए जाने वाले ग्रामीण को कभी भी मछली की शरीर संरचना, जंगल में उसके द्वारा खाया जाने वाला भोजन और उसके पाचन, उसके रोगों, तालाब की सफाई, अधिकतम मछली संख्या आदि के संबंध में कोई जानकारी नहीं होती है। उससे केवल यही आशा की जाती है कि वह अधिक संख्या में तथा सबसे बड़ी मछली को तेजी से पैदा करें। परिणाम यह हुआ है कि मछली उत्पादक पशुओं को अच्छा पोषण नहीं दे पाते (उनमें से कई तो केवल मानव का मल ही खिलाते हैं) और अप्राकृतिक तरीकों पर निर्भर करते हैं जैसे की रासायनिक रूप से बनाए गए भोजन, एंटी फंगल, कृषि रसायन तथा एंटीबायोटिक। फोर्मालिन तथा मेलाचाइट ग्रीन, तालाबों में भी विसंक्रामक के रूप में प्रयुक्त किए जाने वाले रसायन हैप्। ये विषैले हप्ैं परंतु भारत में किसी को भी प्रतिबंधित नहीं किया गया है। मछलियां जीवित प्राणी है और भली प्रकार से रहने के लिए उनकी हमारे समान ही जरूरतें होती हैं - जैसे कि पूर्ण, प्राकृतिक, कीटनाशक मुक्त, गैर विशाक्त भोजन तथा पानी। इसके अभाव में वे बीमार हो जाती है।

मछलियों का आमतौर पर गंदे या जालीदार पिंजरों में प्रजनन किया जाता है। अधिक संख्या में उन्हें रखा जाना और बीमार मछली को पहचानने तथा उसे अलग करने में असमर्थता (आखिरकार हमारे देश में कोई मछली पशु चिकित्सक नहीं है) रोग के तेजी से फैलने को बढ़ावा देती है। इसे नियंत्रित करने तथा रोकने के लिए पानी में मिलाकर या भोजन के साथ अथवा उन्हें इंजेक्शन देकर प्रोफीलैक्टिक एंटीबायोटिक दिए जाते हैं। समूचे विश्व में होने वाली सभी वैज्ञानिक समीक्षाओं ने दर्शाया है कि यह मत्स्य पालन वाली मछलियों तथा शेलफिश में एंटीबायोटिक अपशिष्ट, एंटीबायोटिक प्रतिरोधी बैक्टीरिया, सतत आॅर्गेनिक प्रदूषक तत्वों, धातुओं, परभक्षियों तथा वायरस के वृद्धित स्तरों में परिणत होता है। जब मछली के एक झुंड को बाहर निकाला तथा मारा जाता है, तो पानी में मौजूद एंटीबायोटिक तालाब में आने वाली मछलियों की अगली खेप को प्रभावित करता है।

परिणाम दो चीजें होती हैं - मछली किसी विशिष्ट एंटीबायोटिक के प्रति प्रतिरोधी हो जाती है और इसलिए उन्हें जिंदा रखने के लिए अधिकाधिक गहन संयोजनों का उपयोग किया जाना होता है। यह उनके मांस के माध्यम से उनके खाने वालों तक भी पहुंचता है। परंतु शाकाहारी भी इसका शिकार बनते हैं। पानी रिस कर भूमि में चला जाता है, जहां सब्जियां तथा अनाज उगाए जाते हैं। ओडिशा में तटीय एक्वाकल्चर फार्म संदूषित पानी को समुद्र में फेंकते हैं। त्त्द्ध एंटीबायोटिक धुल कर दूर स्थानों पर चले जाते हैं और इन्हें शेलफिश सहित अन्य मछलियों द्वारा खाया जाता है। इटली जैसे नियंत्रित देशों में अन्वेषण दर्शाते हैं कि ट्राउट तथा सीबास में 250 से 600 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम के मध्य के एंटीबायोटिक संकेंद्रण होते हैं। भारत में जहां यह पूरी तरह अनियंत्रित है, संकेंद्रण और भी अधिक होंगे। आज तक संसार में कहीं भी और भारत में तो छोड़ ही दीजिए, मत्स्य कृषि हेतु कोई मानक रोग रोकथाम तथा उपचार विनियमन नहीं है। चूंकि मछलियों हेतु कोई एंटीबायोटिक विशिष्ट रुप से नहीं बनाए गए हैं, अत: मानव वाले एंटीबायोटिक का ही उपयोग किया जाता है।

वैज्ञानिकों ने दर्शाया है कि लैटिन अमेरिकी के 1992 में हैजा की महामारी हेतु उत्तरदायी होने वाला बैक्टीरिया एंटीबायोटिक प्रतिरोधी था जो इक्वाडोर के झींगा उद्योग में इसके अधिक उपयोग के परिणामस्वरुप हुआ था।

मत्स्य कृषि औद्योगीकरण वाले देशों में क्वीनोलोन का उपयोग सीमित कर दिया गया है क्योंकि वह मानव संक्रमण हेतु महत्वपूर्ण है। वह जैविकीय रुप से समाप्त नहीं होते और वर्षों तक भूमि पर बने रहते हैं। तथापि, क्वीनोलोन का उपयोग भारत, चीन तथा चिली में पूर्णत: असीमित है। उदाहरण के लिए चिली में वार्षिक तौर पर मानव उपभोग हेतु 10-12 मीट्रिक टन तथा मत्स्य कृषि हेतु 110 टन क्वीनोलोन का उपयोग किया जाता है। चीन और भारत में क्वीनोलोन प्रतिरोधिता एक महत्वपूर्ण जन स्वास्थ्य समस्या के रूप में उभरी है।

दवा प्रतिरोधिता करने के अलावा, एंटीबायोटिक्स के उपभोग के मानवों पर अन्य गंभीर प्रभाव होते हैं। यह हमारे शरीर में वनस्पति को बदलता है, जिससे जीवाणु संक्रमण का खतरा पैदा होता है। (आम भाषा में, जब आप लंबे समय तक एंटीबायोटिक्स लेते हैं, तो क्या आपको अपने मल में परिवर्तन नहीं दिखता है? इससे पता चलता है कि आप की आंतों में वनस्पति बदल गई है और पाचन भिन्न है)। मनुष्य एलर्जी के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं। इनका पता नहीं चल पाता क्योंकि आप उन एंटीबायोटिक से अनजान हैं जिन्हें आप खा रहे हैं। समय के साथ ये शरीर को कैंसर जैसी प्रमुख बीमारियों के प्रति संवेदनशील बनाते हैं। उदाहरण के लिए, भोजन में क्लोरैम्फेनिकोल के अपशिष्ट के परिणामस्वरूप एप्लास्टिक एनीमिया हो सकता है, जिससे गंभीर बोन मैरो रोग हो जाते हैं। नाइट्रोफुरान एंटीबायोटिक्स, कैंसर का कारण बनते हैं।

हम सभी मछली फार्म एंटीबायोटिक महामारी के प्रति संवेदनशील हैं जो पैसे के नाम पर हम पर थोपी जा रही है। आप उन्हें उस पानी में पीएंगे जो भूमिगत स्रोतों से आते हैं तथा मछली तालाबों से निकलने वाले पानी से संदूषित हो गए हैं। आप इस पानी के साथ अपनी फसलों की सिंचाई करते होंगे और आपको यह जानकारी नहीं है कि इसमें एंटीबायोटिक प्रचुर मात्रा में होने वाला मछली का पानी मिला हुआ है। इस पानी का सेवन अन्य पशु प्रजातियों द्वारा भी किया जाता होगा जिनके मांस या दूध का मनुष्यों द्वारा उपभोग किया जाता है। एंटीबायोटिक्स मछली फार्मों के आस-पास की सभी वनस्पतियों और जीवों को प्रभावित करते हैं और पारिस्थितिकीय तंत्र को बदलते हैं।

अब समय आ गया है कि हम इसे समझें कि हम अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के नाम पर क्या कर रहे हैं। पैसा कमाने का कोई अर्थ नहीं रह जाता है यदि इसमें से अधिकतर उपचार न किए जा सकने वाले रोग के इलाज के लिए अस्पतालों को बनाने में लग जाए। यदि हम इस अस्थिर नीली क्रांति को जारी रखने जा रहे हैं (हरित क्रांति एक बड़ी आपदा रही है। कोई कीट समाप्त नहीं हुआ और भूमि अब इतनी संदूषित हो गई है कि इसे ठीक भी नहीं किया जा सकता। प्रत्येक किसान कीटनाशक, उर्वरक और पानी की अधिक मात्रा पर पूर्ण निर्भरता के कारण कर्ज में है), तो हमें मूलभूत सिद्धांतों को सही करने की आवश्यकता है। अधिक, बड़े, तेज के लक्ष्यों तक पहुंचने की कोशिश करने के बजाय, हमें इस पर ध्यान देना चाहिए कि स्वच्छता स्थितियों को कैसे बेहतर बनाएं, मछलियों की अधिक संख्या को कैसे रोकें, मछली पशु चिकित्सकों और निरीक्षकों को बनाएं, एंटीबायोटिक्स पर प्रतिबंध लगाएं। जब तक यह नहीं होता, तब तक मछली खाना बंद कर दें, और अगली बार जब आप किसी से मछली के सेहतमंद होने के बारे में सुनें तो इस जानकारी को उनके साथ साझा करें।

( लेखिका केन्द्रीय मंत्री व पर्यावरण विद् हैं )


मेनका गांधी ( 5 )

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