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जम्मू-कश्मीर : नागपाश से मुक्ति का दिवस

अतुल तारे

जम्मू-कश्मीर : नागपाश से मुक्ति का दिवस

नागपंचमी के दिन देश को नागपाश से मुक्ति मिल गई। आज राष्ट्र एक इतिहास को अपनी आंखों के सामने गढ़ते देख रहा है। यह उत्सव का दिन है। यह अभिनंदन का एक अपूर्व अवसर है। नि:संदेह देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज इस नारे को फिर एक बार चरितार्थ कर दिया कि मोदी है तो मुमकिन है। स्वाधीनता के पश्चात तत्कालीन कर्णधारों ने देश के मस्तक पर जो एक कलंक का टीका धारा 370 के रूप में लगाया था, आज उस कलंक को संसद में गृहमंत्री अमित शाह की घोषणा ने धो दिया कि धारा 370 अब एक इतिहास है। यह पल एक अनुष्ठान के लगभग पूर्ण होने का है। तीन पीढिय़ों का संघर्ष है इसके पीछे। जहां बलिदान हुए मुखर्जी वह कश्मीर हमारा है। एक देश में दो पंथ दो निशान नहीं चलेंगे, इस स्वप्न को साकार करने में असंख्य बलिदान हुए हैं। आज वे यह दिवस देखने के लिए हमारे साथ नहीं हैं, अत: आज हमें उनका पुण्य स्मरण भी करना चाहिए।


आज इस इतिहास की रचना के पीछे, साथ ही आज देश का जो भूगोल बदल रहा है, उसके पीछे वह कौनसा रसायन शास्त्र है, आज यह भी हमको समझने की आवश्यकता है। कारण यह संघर्ष अभी पूर्ण विराम की स्थिति में नहीं है। देश से लगभग अप्रासंगिक हो चुकी राजनीतिक ताकतें फिर गोलबंद होना शुरु हो गई हैं और वे राष्ट्रहित को परे रखकर फिर आत्मघाती, राष्ट्रघाती कदम नहीं उठाएंगी, यह हमें नहीं मानना चाहिए। यह गहराई से समझने की आवश्यकता है कि जब-जब राष्ट्रहित का कोई संवेदनशील विषय सामने आता है यह ताकतें एकजुट दिखाई देती हैं। टुकड़े-टुकड़े गैंग हों या अवार्ड वापसी गिरोह, तीन तलाक पर आंसू बहाने वाले कथित बुद्धिजीवी हों या कश्मीर राग अलापने वाले शातिर राजनेता इन सबके तार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और वे अपनी बंद होती राजनीतिक दुकानेें ही नहीं बल्कि जो अब राजनीतिक मॉल या बिग बाजार हैं, पर गिरते शटर देखकर बौखलाएंगे। यह समझना होगा कि एक बार पाक प्रायोजित आतंकवाद या पाकिस्तान से सीधी लड़ाई आसान है पर घर में रहकर घर में घात करने वाले इन मुट्ठी भर राजनेताओं के मंसूबे अब और खतरनाक हो सकते हैं। यही कारण है कि मोदी सरकार ने अपने पहले एवं दूसरे कार्यकाल में भी पीडीपी एवं नेशनल कॉन्फ्रेंस के अलावा जम्मू-कश्मीर में दूसरी राजनीतिक शक्तियों को योजनाबद्ध तरीके से मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया। यही नहीं विगत सात दशक में जम्मू और लद्दाख आज जो तुलनात्मक रूप से शांत हैं। आज घाटी में भी मात्र ढाई तीन जिलों में ही आतंकवाद का नासूर है और वहां भी एक महीन धारा मुख्यधारा में शामिल होने के लिए आतुर है जो उसके पीछे भी एक सतत साधना है, जो निष्काम भाव से तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें ना रहें का गान कर रही है। यही एक रसायन शास्त्र है, जिसने आज जम्मू-कश्मीर में इतिहास को भी रचा है भूगोल को भी बदला।

बेशक संसद में गृहमंत्री अमित शाह की घोषणाएं साहसिक हैं, ऐतिहासिक हैं। पर इसकी भावभूूमि तैयार करने का काम दशकों से चल रहा है। यही कारण है कि आज जो दल कश्मीर में अपने को प्रमुख राजनीतिक दल मानते हैं अपनी विश्वसनीयता खो चुके हैं। आज जम्मू और लद्दाख ही नहीं घाटी भी यह समझ रही है कि जिन्हें वह अपना समझ रही थी वही उनके हक को लूटते रहे। अत: आज जब अमित शाह संसद में गर्जना कर रहे थे तब देश के स्वर के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर का भी स्वर था। आज इस राष्ट्रीय भाव के रसायन की देश में सर्वत्र व्याप्ति हो, यह सामूहिक संकल्प लेने की आवश्यकता है तभी परमवैभव के अनुष्ठान की पूर्णाहुति होगी।

एक ऐतिहासिक विजयी क्षण के पलों में देश को असीम धैर्य की भी आवश्यकता है। उन्माद से बचना होगा, अपूर्व सतर्कता बरतनी होगी। सीमा पर जवान मुस्तैद हैं। केन्द्र सरकार का हर कदम और भरोसा बढ़ाता ही है। देशवासी भी अभिनंदन के पात्र हैं, कारण आज देश में एक राष्ट्रीय ज्वार दिखाई दे रहा है। यह ज्वार ऊर्जा का, उत्साह का संदेश लेकर बना रहे। दिशा न भटके इसकी चिंता हम सबको करना है, यह हम कर लेते हैं तो आज धारा 370 इतिहास बनी है, कल पाक अधिकृत कश्मीर हमारा होगा और कल.....

इति शुभम् ...

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