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भारतीय संस्कृति पर आघात करता 'बिग बॉस'

भारतीय संस्कृति पर आघात करता

छोटे परदे पर प्रसारित किए जा रहे विवादित और भारतीय मर्यादाओं की धज्जियां बिखेरने वाले रियलिटी शो 'बिग बॉस' को लेकर देशभर में विरोध की आवाज उठने लगी है। अब इसके विरोध में करणी सेना भी कूद गई है। वास्तव में पश्चिमी शैली पर आधारित किसी भी विचार को भारतीय जीवन का हिस्सा कैसे बनाया जाए, यह शो उसी का प्रमाण लगता है। बड़ी बात यह भी है कि 'बिग बॉस' के हर सीजन में कुछ ऐसा दिखाने का प्रयास किया जाता है, जो पूरी तरह से भारतीय मान-मर्यादाओं और संस्कृति पर कुठाराघात करता है। भारत में चल चित्रों के माध्यम से हिन्दू संस्कृति को विकृत रूप में प्रस्तुत करने का खेल लंबे समय से चल रहा है, जबकि अन्य संप्रदायों को सम्मान जनक तरीके से प्रस्तुत किया जाता रहा है। यह सारा खेल अभिव्यक्ति की आजादी और धर्म निरपेक्षता की आड़ में चल रहा है।

'बिग बॉस' के माध्यम से जिन चरित्रों का प्रदर्शन किया जाता रहा है, उसका विरोध कई बार समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा किया जा चुका है। ऐसा निरंतर हो भी रहा है, लेकिन देश में एक वर्ग ऐसा भी है जो ऐसे कार्यक्रमों का स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति के नाम पर समर्थन करता है। ऐसा लगता है कि जो व्यक्ति या संस्थाएं इसका समर्थन करती हैं, वे भारत के मूल को जानती ही नहीं हैं। इसलिए 'बिग बॉस' को कहीं न कहीं इसे घर-घर में बुराई पहुंचाने वाला कार्यक्रम ही कहा जाने लगा है। इस बार के 'बिग बॉस' की शुरुआत ही गलत ढंग से हुई है। इसमें कुंआरी लड़कियों को बिस्तर पर उनके साथ सोने के लिए लड़के दिए गए हैं। इस बात को पूरा देश देख रहा है, जिसके चलते देश के युवाओं में इसका बहुत ही गलत संदेश जा रहा है। इसलिए 'बिग बॉस' को पूरी तरह से भारतीय संस्कृति का विरोधी कहा जाए तो गलत नहीं होगा।

हम जानते हैं कि समाज के सामने जिस प्रकार के दृश्य उपस्थित किया जाता है समाज वैसा ही आचरण करने की ओर प्रवृत्त होता है। याद कीजिये, पहले गर्भवती महिलाओं के कमरे (बेडरूम) में देवी-देवताओं की तस्वीरें टांगी जाती थीं, ताकि बच्चे उन्हीं की तरह तेजस्वी और यशस्वी बनें और मर्यादित आचरण करें। अब फिल्मी हीरो-हीरोइन की फोटो टांगी जाती है। यह पश्चिमी देशों की नकल है। समाज के बड़े हिस्से को यह भी नहीं पता कि हमारी संस्कृति क्या है? उनको इस बारे में बताया भी नहीं जाता। जब इसको नहीं बताया जाएगा तो स्वाभाविक है कि जो बताया जाएगा, उसे वह ग्रहण करने लगेगा। भारतीय संस्कृति को प्रवाहित करने वाले धारावाहिकों को प्रसारित किया जाए तो उसे बड़ी संख्या में देखा जाएगा। इसका उदाहरण रामानन्द सागर द्वारा निर्मित रामायण और बीआर चोपड़ा द्वारा निर्मित महाभारत नामक धारावाहिक रहे हैं। यह कितने लोकप्रिय रहे, पूरे देश ने देखा है। रामायण के प्रसारण के समय पूरा देश थम जाता था। बाजार की चहल-पहल गायब हो जाती थी। इससे यह साबित होता है कि भारतीय संस्कृति पर आधारित कोई धारावाहिक आज भी अपने देश में स्वीकार करने योग्य है।

जहां तक 'बिग बॉस' को प्रसारित करने का सवाल है तो यह सामाजिक बुराई को व्यक्त करने वाला ही है। कहा जाता है कि बुराई से बुराई का जन्म होता है। कोई भी बुराई अच्छा परिणाम नहीं दे सकती। सवाल यह भी है कि 'बिग बॉस' में जो कुछ दिखाया जा रहा है, वह ऐसी बुराई है जो वैवाहिक संबंधों को तोड़ने के लिए प्रेरित करता है। पति और पत्नी के सात जन्मों के बंधन वाली अवधारणा को मटियामेट कर रहा है। भारत में कुंवारी कन्या को देवी के रूप में देखे जाने की परंपरा रही है। लेकिन 'बिग बॉस' में उसे भोग की वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। कुंवारी लड़की को अपरिचित लड़कों के साथ सोने के लिए बाध्य किया जा रहा है। जो भारतीय दृष्टिकोण से सही नहीं है।

'बिग बॉस' पूरी तरह से पश्चिमी विकृति पर आधारित एक रियलिटी शो है। जिसमें भारतीय संस्कृति और नारी की मर्यादा को तार-तार करने का षड्यंत्र किया जा रहा है। यह सभ्य घराने की लड़कियों को बिगाड़ने की साजिश है। अगर 'बिग बॉस' जैसा दृश्य भारत में आम हो जाए तो पूरा देश छिन्न-भिन्न हो जाएगा। मर्यादाएं मटियामेट हो जाएंगी। इसलिए सरकार को चाहिए कि इस पर तत्काल रोक लगाए। अदालतों को इसका स्वत: संज्ञान लेना चाहिए। आमजन को भी चाहिए कि वे सच्चाई को समझें और ऐसे रियलिटी शो को देखने से परहेज करें। देश के संस्कारों को मिटाने का काम करने वाले ऐसे रियलिटी शो का समाज की ओर से भी पुरजोर विरोध किया जाना चाहिए। इसमें दो राय नहीं कि हमारे समाज पर फिल्मों और टीवी धारावाहिकों का प्रभाव होता है। जैसा हम देखते हैं, वैसा बनने की कोशिश करने लगते हैं। आज समाज में कई प्रकार की बुराइयों का समावेश होने के पीछे यही कारण माना जा रहा है।

हमारे फिल्मी-धारावाहिक निर्माता-निर्देशकों को भी यह ध्यान रखना चाहिए कि वे ऐसी किसी भी धारावाहिक का निर्माण न करें जो भारतीय संस्कृति के विरोध में हों। क्योंकि इससे उनके बच्चे भी बिगड़ेंगे। निर्माता-निर्देशक अच्छा और संस्कारित संदेश देने वाले धारावाहिक का निर्माण करें तो उनकी समाज की बहुत बड़ी सेवा होगी। कमाई होगी सो अलग।

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Swadesh Digital ( 0 )

स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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