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महल का मोह

महल का मोह


एक राजा था। उसने बहुत ही सुंदर और विशालकाय महल बनवाया। उसे उस महल से मोह हो गया। जो भी उसके पास आता, वह उससे महल की प्रशंसा अवश्य करता । राजा महल की अद्भुत नक्काशी और सुंदरता में ही खोया रहता। उसने राजकाज में रुचि लेना भी बंद कर दिया।

लोग राजा को महल के ख्यालों में खोए देखकर चिंतित हो गए। चतुर महामंत्री ने इसका एक उपाय सोचा। एक दिन एक वृद्ध साधु राजा के पास आया और महल देखकर उसकी खूब प्रशंसा करने लगा। राजा अपने महल की तारीफ सुनकर बहुत प्रसन्न हो गया और बोला, बताइए, भला इसके जैसा महल होगा कहीं ? उसकी बात पर साधु मुस्कराते हुए बोला, हो सकता है, ऐसा अद्भुत महल न हो, लेकिन मुझे तो इस महल में भी दो भारी कमियां दिखाई देती हैं। यह सुनकर राजा हैरानी से बोला, असंभव। बताइए वे दो कमियां कौन सी हैं? साधु बोला, पहली कमी तो यह है कि एक दिन यह महल नष्ट हो जाएगा और दूसरी कमी यह कि इस महल में रहने वाले का भी एक न एक दिन अंत होगा। फिर यह महल अद्भुत कहां हुआ? अद्भुत तो व्यक्ति के सद्कर्म होते हैं, जो उसके जाने के बाद भी जिंदा रहते हैं। यह सुनकर राजा की आंखें खुल गईं। उसका महल के प्रति मोह मिट गया।

तभी साधु अपने मूल रूप में आ गया। वह कोई और नहीं महामंत्री था। यह देखकर राजा आश्चर्य से बोला, महामंत्री जी आप! आज आपने मेरी आंखें खोल दीं। मैं अब इस निर्जीव महल की सुंदरता में खोने के बजाय अपनी प्रजा की उचित देखभाल और सद्कर्मों पर ध्यान दूंगा। यह सुनकर रानी और राजपरिवार के सभी लोगों ने राहत की सांस ली। प्रजा भी प्रसन्न हुई। लोग महामंत्री की सूझबूझ और साहस की प्रशंसा करने लगे। राजा अपनी प्रजा की समुचित देखभाल करने लगा।

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