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कर्नाटक में कांग्रेस सरकार का एक सच यह भी, करते रहे 15 किसान हर सप्‍ताह आत्‍महत्‍या

कर्नाटक में कांग्रेस सरकार का एक सच यह भी, करते रहे 15 किसान हर सप्‍ताह आत्‍महत्‍या

बेंगलुरु/डॉ.मयंक चतुर्वेदी। किसान कहने से हमारे जहन में अन्‍नदाता की तसवीर उभरती है| ये उभरा हुआ चित्र हमें इस बात के लिए आश्‍वस्‍त करता है‍ कि वे खेतों में पसीना बहाकर हमारे लिए हिरण्‍यमय धरती से अन्‍नमय सोना निकाल रहे हैं|वह भले ही एक बार अपने लिए उसका भरपूर उपयोग न करें लेकिन हमारे पेटों को भरने के लिए उसे सहज ही स्‍वयं भूखे रहकर दे देंगे, ताकि हमारे पेट भरे रहें और हम ऊर्जा से पूर्ण रह सकें। सच, उनकी मेहनत हमारे घरों को रोशन रखती है| हमारे जीवन को महफूज रखती है| इन किसानों से जुड़ा उतना ही एक सत्‍य यह भी है कि भारत के कर्नाटक राज्‍य में कांग्रेस की सिद्धारमैय्या सरकार के रहते हुए यहां के किसान कर्ज से परेशान होकर, फसल बर्बाद होने, साहूकारों की वसूली और गरीबी के चलते प्रति सप्‍ताह आत्‍महत्‍या कर मौत को गले लगा रहे हैं। इस राज्‍य में हर रोज कहीं न कहीं, किसी कोने में 2 से 4 कृषक मौत का फंदा डाल रहे हैं। यह तो है सरकार के द्वारा स्‍वीकार किया गया सच, लेकिन यदि इसके इतर सही मायनों में सच्‍चाई बयां की जाए तो यह आत्‍महत्‍या की प्रतिदिन संख्‍या 7 से 8 तक पहुंच रही है। हर सप्‍ताह 15 से 25 किसान काल-कलवित हो रहे हैं। पिछले साल सरकारी रिकार्ड के हिसाब से कर्नाटक में 848 किसानों ने मौत को अपने लिए चुना था जबकि गत 5 वर्षों में कांग्रेस सरकार में किसानों की आत्‍महत्‍या करने की संख्‍या 3,715 है| इसके इतर पिछले डेढ़ साल में कर्नाटक में करीब 3 हजार किसानों ने आत्महत्या करने की कोशिशें की हैं।

देखा जाए तो यह कृषक राज्‍य में आत्‍महत्‍या करने के लिए इसलिए विवश हुए हैं क्‍योंकि राज्‍य सरकार से उन्‍हें जो तत्‍काल प्राकृतिक आपदा या अन्‍य कारण से खेत खराब होने की स्‍थ‍िति में जो राहत मिलनी चाहिए थी वह नहीं मिल सकी थी, जिस पर बैंक और निजी साहूकारों का बढ़ता ऋण तथा अपने परिवार के भरणपोषण का दायित्‍व न पूरा करने की स्‍थ‍िति को भांपकर अवसाद में आने पर इन किसानों ने अपने लिए मौत को चुना। इसके पहले साल 2015-16 में बारिश की कमी के कारण से सबसे अधिक 1 हजार 478 किसानों ने आत्महत्याएं की थीं। कर्नाटक में पर्यावरण के कारण फसल बर्बाद होने के अलावा किसानों की आत्‍महत्‍या का एक बड़ा कारण उन्हें अपने अनाज के बदले सही दाम नहीं मिलना भी है। राज्य में कांग्रेस सरकार जिन प्रमुख मुद्दों को लेकर जनता से वादा कर भाजपा को 2013 के विधानसभा चुनावों में हराने में कामयाब हुई थी उनमें से भ्रष्‍टाचार के अलावा एक मुद्दा कृषि को आगामी 5 वर्षों में फायदे का धंधा बना देने का भी था, जिसमें कि अब तक सिद्धारमैय्या सरकार पूरी तरह से फेल रही है।

राज्य के कृषि विभाग के मुताबिक अप्रैल 2013 से लेकर नवंबर 2017 के बीच ही 3 हजार 515 किसानों ने सूखे और फसल बर्बाद होने की वजह से आत्महत्याएं कर ली थी। बीते चार माह का आंकड़ा उपलब्‍ध नहीं है| लेकिन आशंका है कि इस दौरान किसानों के मौत को गले लगाने की संख्‍या भी बहुत अधिक है। तथ्‍यों पर गौर करें तो यहां सबसे अधिक गन्‍ना किसानों ने अभी तक अपनी जान दी है| उसके बाद कपास और धान उत्पादक किसानों की संख्‍या है। इसमें भी प्रदेश के उत्तरी कर्नाटक के जिलों में मरने वालों की संख्‍या सबसे अधिक है। किसान आत्महत्या में हावेरी जिला सबसे आगे है। इसके बाद धारवाड़ जिले का नंबर आता है| फिर चिक्कमगलूरु, मैसूरु, मांड्या और उसके आसपास के क्षेत्रों में किसानों ने आत्महत्या की हैं। जबकि मैसूरु और मांड्या दोनों जगह कावेरी नदी का प्रवाह मौजूद है।

इन आत्‍महत्‍याओं को लेकर भाजपा के प्रदेश महामंत्री रवि कुमार का सीधे तौर पर कहना है कि सिद्धारमैय्या सरकार अपनी जिम्‍मेदारी से भाग नहीं सकती। कांग्रेस पार्टी किसानों के हित की बात तो करती है, लेकिन उनके लिए उसने किया कुछ नहीं। आम लोग, गरीब, मजदूरों की पार्टी होने का दावा करने वाली कांग्रेस के लिए यह शर्म की बात रही कि उसके सत्‍ता में रहते हुए कर्नाटक में किसानों की यह दुर्दशा हुई। मुख्‍यमंत्री सिद्धारमैय्या ने वादा किया था कि वे 8 हजार करोड़ रुपए किसानों का ऋण माफ करेंगे लेकिन हकीकत में ऐसा उन्‍होंने नहीं किया। किसानों का सिर्फ 2,600 करोड़ का ही ऋण सरकार ने माफ किया। उनका यह कहना भी एक बड़ा झूठ है कि उनके समय में राज्‍य के किसानों को मुफ्त बिजली और पानी भरपूर मात्रा में दिया गया। इन्‍हीं बातों में राज्‍य के एक बड़े किसान नेता स्‍वर से सुर मिलाते नजर आते हैं| कुरुबुरु शांताकुमार कहते हैं कि जब मुख्‍यमंत्री सिद्धारमैय्या सरकार के पास पिछले पांच सालों में कर्मचारियों के वेतन बढ़ोतरी से लेकर तमाम कामों के लिए पर्याप्‍त धन था तो यह किसानों के लिए क्‍यों नहीं था? इससे यह बात साबित हो चुकी है कि किसान और कृषि कांग्रेस सरकार की प्राथमिकता में कभी नहीं रही। कर्नाटक कृषि मूल्य आयोग के अध्‍यक्ष डॉ. टीएन प्रकाश कम्मारडी किसानों की आत्‍महत्‍या की वजह उनकी अवैज्ञानिक खेती को मानते हैं। वे कहते हैं कि जब किसानों ने सिर्फ एक फसल पैदा की तो राज्‍य में उसका उत्पादन बढ़ा और दाम कम हुए। वास्‍तव में राज्‍य में जरूरत इस बात की है कि किसान खेती करने के पूर्व सही योजना बनाएं।

दूसरी ओर नेशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) ने कर्नाटक में अब तक हुई किसान आत्महत्याओं के लिए 6 कारणों को जिम्‍मेदार ठहराया है। इसके अनुसार कृषि उत्पादों के उदार आयात से किसानों की उपज लाभकारी न रहना, कृषि सबसिडी में कमी से खेती की लागत बढ़ना, खेती के लिए आसानी से कर्ज न मिलना, कृषि सेक्टर में सरकारी निवेश कम होना, उपज की खरीद के लिए समर्थन मूल्य कम होना और खाद्य सुरक्षा में कमी होना वो बड़े कारण हैं जिसके कारण ये घटनाएं घट रही हैं। इसके अलावा जो एक बड़ा कारण यहां मौजूद है वह सूदखोरों का आतंक भी है। पिछले पांच सालों में सिद्धारमैय्या सरकार सूदखोरों पर लगाम नहीं लगा सकी। सूदखोर राज्‍य में गरीब किसानों से 30 से 40 फीसदी ब्याज दर वसूल रहे हैं। कुछ भी हो, कहना यही होगा कि किसान आत्‍महत्‍या का जो दौर पिछले पांच सालों से इस राज्‍य में चल रहा है वह बहुत भयावह है।

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