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अट्टहास, चुटकी और कांग्रेस की राजनीति

अट्टहास, चुटकी और कांग्रेस की राजनीति

हंसना अच्छा है या बुरा, यह सवाल दुविधा पैदा कर रहा है। एक कहावत है कि ‘खांसी सब रोगों की जड़ है और हंसी लड़ाई का घर है।’ हंसने से शांति छिन जाती है। महाभारत होता है। लाशें बिछ जाती हैं। दूसरी ओर चिकित्सक कहते हैं कि हंसने से बीमारियां दूर होती हैं। तन और मन स्वस्थ रहता है। बाबा रामदेव भी लोगों को हास्य योग सिखा रहे हैं। हंसने के तरीके बता रहे हैं। ऐसे में किस पर यकीन करें और किस पर नहीं?

रही बात राजनीति की तो वहां शब्दों का व्यापार खूब होता है। विकास हो चाहे न हो, कोई फर्क नहीं पड़ता। महाभारत काल में अपने पूर्वजन्म में महिला रही शिखंडी को आगे करके भीष्म पितामह का अंत किया गया था। नरेंद्र मोदी के अकाट्य तर्को से बेदम हो चुकी कांग्रेस भी उनका मुकाबला करने के लिए एक अदद 'महिला अस्त्र' की तलाश कर रही है। इसीलिए रेणुका चौधरी की हंसी पर प्रधानमंत्री की टिप्पणी का मामला उठाकर मोदी पर राजनीतिक प्रहार कर रही है। कांग्रेस उनसे माफी मांगने की मांग कर रही है। रेणुका चौधरी को भी लगता है कि उन पर व्यक्तिगत हमला हुआ है। वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टिप्पणी और केंद्रीय गृहराज्यमंत्री किरण रिजीजू की फेसबुक पोस्ट से बेहद आहत हैं। रिजीजू के खिलाफ तो उन्होंने विशेषाधिकार हनन का नोटिस भी दे दिया है।

प्रधानमंत्री की टिप्पणी में आहत होने जैसा कुछ नहीं था लेकिन लगता है कि रेणुका चौधरी के रूप में कांग्रेस को प्रधानमंत्री और उनकी सरकार को घेरने और संसद में हंगामा करने का मौका मिल गया है। रेणुका चौधरी ने कहा है कि जब संसद में महिलाओं की मर्यादा का सम्मान नहीं किया जाता तो सड़क पर उनकी क्या हालत होगी और ऐसे में निर्भया कोष की जरूरत ही क्या है? कांग्रेस उनके इस स्टैंड से कितना इत्तेफाक रखती है, यह भी तो सुस्पष्ट होना चाहिए। हाल के दिनों में कांग्रेस पोस्टर-पोस्टर खूब खेल रही है। इलाहाबाद में लगे हालिया पोस्टर को इसी रूप में देखा जा रहा है। इलाहाबाद में एक ऐसा पोस्टर लगाया गया है, जिसमें रेणुका चौधरी को द्रौपदी और राहुल गांधी को कृष्ण बताया गया है, जबकि भाजपाइयों की तुलना कौरवों से की गई है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं की इस पोस्टर के पीछे सोच बीजेपी को महिला विरोधी चित्रित करने की है। लेकिन इस पोस्टर में द्रौपदी वाली छवि भी रेणुका चौधरी के लिए बहुत बेहतर तो नहीं ही है। सामान्य विनोद को बतंगड़ बनाना कदापि उचित नहीं है।

श्रीमती रेणुका चैधरी फिलवक्त कांग्रेस सांसद हैं। वर्ष 2004 में वह केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री चुनी गई थी। उन्होंने औद्योगिक मनोविज्ञान में स्नातकोत्तर किया है लेकिन विनोद और आक्षेप का मनोविज्ञान समझ पाने में वह पूरी तरह विफल रहीं, इसमें कोई संदेह नहीं है। तेलगु देशम पार्टी से कांग्रेस तक के सफर में वे कई राजनीतिक विवादों में भी रही हैं। रेणुका चैधरी ने 2011 में पैंट-सूट को हास्यास्पद करार देते हुए कहा था कि पुरुष धोतियों में ज्यादा अच्छे लगते हैं। स्वास्थ्य मंत्री होने के नाते, वह यह आश्वस्त कर सकती हैं कि धोती पहनने से उनकी प्रजनन क्षमता भी बढ़ती है? सवाल उठता है कि क्या किसी महिला को इस तरह की टिप्पणी करनी चाहिए? एक बार उन्होंने महिलाओं से आग्रह किया कि वे अपने पतियों की जगह कंडोम पर विश्वास करें। इस शर्मनाक टिप्पणी को क्या समझा जाये, क्या इसे उनकी पुरुष विरोधी मानसिकता से जोड़कर देखा जाना चाहिए? इसके अलावा भी रेणुका चौधरी पर कई आरोप लगते रहे हैं।

सच्चाई ये भी है कि संसद में महिला-पुरुष का विभेद नहीं होता। हर सदस्य की अपनी गरिमा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महिलाओं का अपमान नहीं कर सकते। उन्होंने तो सभापति की नाराजगी को एक चुटकी लेकर शांत किया और संसद में रेणुका को सभापति की डांट खाने से बचा लिया। रेणुका चौधरी और उनकी पार्टी कांग्रेस को भी इस टिप्पणी से राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करने से बचना चाहिए। क्योंकि अगर वे इसे मजाक समझने की जगह राजनीतिक हथियार बताने की कोशिश करेंगी, तो उनके विरोधी भी उनके चाल और चरित्र से जुड़ी उन तमाम बातों को उजागर करते रहेंगे, जिनको या तो लोग जानते नहीं हैं या फिर समय के साथ भूल चुके हैं। अंत में किरकिरी उनकी ही होगी। यदि ये विवाद बना रहा तो एक सबसे बड़ा नुकसान संसद का समय एक अनुपयोगी विवाद में ही नष्ट होगा, जिसके लिए सिर्फ और सिर्फ रेणुका चौधरी और उनकी पार्टी कांग्रेस ही जिम्मेदार होगी।

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