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तीन तलाक के खात्मे का क्रांतिकारी निर्णय

तीन तलाक के खात्मे का क्रांतिकारी निर्णय

भारत सनातन राष्ट्र होने से कई सामाजिक, राजनीतिक क्रांतिकारी बदलाव हुए है, 1947 में मिली राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद सांस्कृतिक और सामाजिक बदलाव की दो घटनाएं इतिहास में दर्ज हुई है। 6 दिसंबर 1992 को राम जन्मभूमि अयोध्या में बाबर की बर्बरता के प्रतीक बाबरी ढांचे को कारसेवकों के एक समूह ने ध्वस्त कर दिया। यह घटना हिन्दुओं के पांच सौ वर्ष पुराने उस हमले का प्रतिकार था, जिसने राम जन्मभूमि के मंदिर को नष्ट भ्रष्ट कर हिन्दू भावना को लहूलुहान किया था। इसी प्रकार 28 दिसंबर 2017 का दिन भी सामाजिक क्रांतिकारी बदलाव का है, जब मोदी सरकार ने साहसिक कदम उठाते हुए तीन तलाक का गैर कानूनी और अपराध मानने वाला विधेयक लोकसभा में पारित कराया। यह भारत की करीब दस करोड़ महिलाओं को तीन तलाक के अत्याचार से मुक्ति दिलाने का सार्थक और कारगर कदम है। जहां मुस्लिम महिलाओं ने जश्न मनाया, क्योंकि यह 1400 वर्ष पुरानी तीन तलाक की बेड़ियों से मुक्ति दिलाने वाला विधेयक पारित हुआ है। सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने बहुमत से तीन तलाक को असंवैधानिक, गैर कानूनी करार देते हुए सरकार से इस बारे में कानून बनाने का निर्देश दिया था। इन दो क्रांतिकारी बदलाव के दर्द से ऐसे लोग हायतौबा कर रहे हैं, जिनको भारत की सांस्कृतिक, परम्परा और सामाजिक उत्पीड़न से न कोई सरोकार है और न मातृभूमि के प्रति अटूट निष्ठा है। एआईएमआईएम के प्रमुख असुदुद्दीन ओबैसी के कथन से इन दोनों क्रांतिकारी बदलाव का दर्द झलकता है। उन्होंने एक टीवी चैनल में कहा कि 'हम न 6 दिसंबर की घटना को भूल सकते हैं और न 28 दिसंबर की इस घटना को भूल सकते हैं, जब तीन तलाक के खिलाफ विधेयक लोकसभा में पारित हुआ।’ 'हम’ से उनका तात्पर्य उन मुल्ला मौलवियों, पर्सनल मुस्लिम लॉ बोर्ड और उन कट्टर पंथियों से है, जिन्होंने 6 दिसंबर को भी तौबा-तौबा करते हुए चीख पुकार की थी। उस समय वोट के लिए झपटने वाले सेकुलरों ने भी इन कट्टर पंथियों का साथ दिया था। अब 28 दिसंबर को जब तीन तलाक के खिलाफ कानून का विधेयक पारित हुआ तो वैसा ही विरोध, वैसी ही इस्लाम खतरे की बातें हो रही है। तीन तलाक के खिलाफ बिल पर ओबैसी के प्रस्ताव पर जब मत विभाजन हुआ तो विधेयक के विरोध में केवल दो मत मिले। इससे ओबैसी की औकात सामने आ गई। कांग्रेस के प्रमुख राहुल गांधी सदन में नहीं थे। जो मुस्लिम सदस्य भाजपा, कांग्रेस के है, उन्होंने भी विधेयक का समर्थन किया। ओवैसी की राजनीतिक दृष्टि से न कोई औकात है और न कोई प्रभाव। केवल मीडिया में उनकी आवाज को महत्व मिलता है। मोदी सरकार के मंत्री और जाने माने पत्रकार एमजे अकबर ने तथ्यों के आधार पर जो तर्क प्रस्तुत किए उनका उल्लेख करना आवश्यक है। उन्होंने इस्लाम खतरे में है की आवाज को करारा जवाब देते हुए कहा कि इस्लाम खतरे में कहकर ही देश तोड़ा और अब इस्लाम खतरे में कहकर मुस्लिम महिलाओं पर अत्याचार की पैरवी की जाती है। उन्होंने कहा कि इस विधेयक से मुस्लिम मर्दों की जबरदस्ती खतरे में है। उन्होंने आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की विश्वसनीयता और वैधानिकता पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसके सदस्यों को जिसने चुना, इसको मान्यता किसने दी। इस्लाम में क्या ऐसे बोर्ड का जिक्र है। कांग्रेस का सुझाव है कि हम सरकार के साथ है, लेकिन इस विधेयक को स्टेंडिंग कमेटी को भेजा जाए। कांग्रेस की दुविधा यह है कि यदि इस विधेयक का विरोध किया तो दस करोड़ मुस्लिम महिलाएं भाजपा के साथ खड़ी दिखाई देगी। यह भरोसा किया जा सकता है कि राज्य सभा में भी यह विधेयक पारित होकर, इस पर राष्ट्रपति की मोहर लग जाएगी। जो तीन तलाक के खिलाफ विधेयक को राजनीतिक तराजू पर तौलते हैं, उनके लिए केन्द्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद के कथन का संदर्भ देना होगा। उनका कहना है कि (1) इस कानून को सियासत की नजर से न देखा जाए (2) दलों की दीवारों में न बांधा जाए (3) मजहब के तराजू पर न तौला जाए (4) वोट बैंक के खाते से न परखा जाए, लेकिन राजनीति की विडंबना है कि इस नदी के किनारे ऐसे बगुले अधिक है, जिनकी निगाह हमेशा वोट की मछली पर रहती है।

इस बारे में सेकूलर के नाम से वोट की राजनीति करने वाले नेतृत्व के इतिहास का भी उल्लेख करना होगा। शाहबानो 62 वर्षीय 1978 में उसे तलाक दे दिया था। उसके पांच बच्चों और स्वयं के भरण पोषण का कोई साधन नहीं था, इसलिए उसने भरण पोषण के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने पांच सौ रु. माह गुजारा भत्ता देने का निर्णय दिया। पति ने यह गुजारा भत्ता देने से भी इंकार कर दिया। फिर शाहबानो की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में अपील की गई। अपराधिक प्रक्रिया संहिता (सी.पी.सी.) के अनुभाग 125, जो जाति, मजहब से परे सबके लिए लागू है के तहत शाहबानो के पक्ष में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया। जिस तरह तीन तलाक के कानून के खिलाफ कट्टरपंथी गला फाड़ रहे हैं, उसी तरह उस समय भी कट्टरपंथी मुल्ला, मौलवियों ने सड़कों पर चिल्लाते हुए कहा कि इससे शरीयत का हनन हो रहा है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने धमकी दी कि यदि सरकार सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को रद्द नहीं करती तो देश व्यापी आंदोलन होगा। गणतंत्र दिवस के बहिष्कार की धमकी दी गई। रैलियां भी निकाली। उस समय कांग्रेस की राजीव गांधी सरकार थी। प्रारंभ में इस विरोध की परवाह नहीं करते हुए, इस निर्णय के पक्ष में आरिफ मोहम्मद खान ने संसद में प्रभावी तर्क प्रस्तुत किए। कट्टर पंथियों के विरोध के सामने घुटने टेकते हुए राजीव सरकार ने बहुमत के आधार पर मुस्लिम महिला तलाक संबंधी अधिकार संरक्षण अधिनियम 1986 पारित कर दिया। इससे तलाक शुदा पत्नी को गुजारा भत्ता देने की जिम्मेदारी इददत तक ही सीमित हो गई। राजीव गांधी के मंत्री जेड आर. अंसारी ने संसद में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की आलोचना की। कांग्रेस की राजीव सरकार ने मुस्लिम वोट बैंक के लालच में अपने सिद्धांतों के साथ न केवल समझौता किया, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय को भी नकार दिया। उस समय और अब की स्थिति में अंतर यह है कि पहले कांग्रेस की राजीव सरकार थी और अब है भाजपा की मोदी सरकार जो न केवल साहसिक निर्णय लेती है, बल्कि अपने संकल्पों के साथ कोई समझौता नहीं करती। यह भी बदलाव है कि मुस्लिम जो मुल्ला-मौलवियों और कट्टरपंथियों के फतवे से वोट देते थे, अब वे अपने भविष्य के बारे में स्वयं निर्णय करते हैं। मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक के खिलाफ खड़ी है। इस बारे में एआईएमआईएम के प्रमुख असुद्दीन ओबैसी के दर्द ने सच्चाई व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि एक ओर जनेऊधारी, मंदिर मंदिर जाने वाले और दूसरी ओर हिन्दू राष्ट्रवादी है, दोनों के बीच हम फंसे है। 'हम’ का आशय मुस्लिम कट्टर पंथी ही है। इनको हिन्दू राष्ट्रवाद अर्थात देशभक्त जनता से खतरा है। कबीर दासजी ने कहा है कि दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक)

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