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पिंड दान से मिलेगी पितरों को मुक्ति

पिंड दान से मिलेगी पितरों को मुक्ति

रांची। इस साल पितृ पक्ष सात सितम्बर से शुरू हो रहा है, जो 20 सितम्बर तक चलेगा। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से महीने की अमावस्या तक के 15 दिनों को पितृपक्ष कहा जाता है। पितरों के लिए श्राद्ध करना एक महान कार्य है। माना जाता है कि मनुष्य पर देव ऋण, गुरु ऋण और पितृ ऋण होता है। माता-पिता की सेवा करके मरणोपरांत पितृ पक्ष में पूर्ण श्रद्धा से श्राद करने पर इस ऋण से मुक्ति मिलती है। माना जाता है कि पिंडदान करने से मरने वाले व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। पितरों की संतुष्टि के उद्देश्य से श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले तर्पण, ब्राह्मण भोजन, दान आदि कर्मों को श्राद्ध कहा जाता है।

इसे पितृयज्ञ भी कहते हैं। श्राद्ध के द्वारा व्यक्ति पितृऋण से मुक्त होता है और पितरों को संतुष्ट करके स्वयं की मुक्ति के मार्ग पर बढ़ता है। श्राद्ध या पिंड दान दोनों एक ही शब्द के दो पहलू है। पिंड दान शब्द का अर्थ है अन्न को पिंडाकार में बनाकार पितर को श्रद्धा पूर्वक अर्पण करना इसी को पिंडदान कहते हैं। वैसे तो हरिद्वार, गंगासागर, कुरूक्षेत्र, चित्रकूट, पुष्कर आदि कई स्थानों में विधिवत श्राद करने से भगवान पितरों को मोक्ष प्रदान करते हैं। कहा जाता है कि श्रीराम और माता सीता ने भी राजा दशरथ की आत्मिक शांति के लिए यहां पिंडदान किया था। गया में विधिवत श्राद करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और आने वाली सात पीढ़ियों का उद्धार होता है। पंडित रामदेव पाण्डेय के अनुसार परिवार में से कोई एक व्यक्ति गया में पितरों का श्राद और पिंडदान करता है। गरुड़ पुराण में लिखा है कि गया जाने के लिए घर से निकले एक-एक कदम पितरों को स्वर्ग की ओरर ले जाने के लिए सीढ़ी की भांति बनते हैं।

गया को विष्णु का नगर माना जाता है। यह मोक्ष की भूमि कहलाती है। विष्णु पुराण और वायु पुराण में भी इन सभी बातों का वर्णन है। विष्णु पुराण के अनुसार गया में पूर्ण श्रद्धा से पितरों का श्राद करने से उन्हें मोक्ष और स्वर्ग में स्थान मिलता है। माना जाता है कि गया में भगवान विष्णु स्वयं पितृ देवता के स्वरूप में उपस्थित हैं इसलिए इसे पितृ तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है। गया में हर साल इस मौके पर पितृ पक्ष मेला भी लगता है।

पंडित रामदेव पाण्डेय ने बताया कि श्रद्धा और मंत्र के मेल से पितरों की तृप्ति के निमित्त जो विधि होती है उसे 'श्राद्ध' कहते हैं। इन पंद्रह दिनों में लोग अपने पितरों (पूर्वजों) को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर पार्वण श्राद्ध करते हैं। पिता-माता आदि पारिवारिक मनुष्यों की मृत्यु के पश्चात् उनकी तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले कर्म को पितृ श्राद्ध कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि इन दिनों पितरों यानी परिवार के बुजुर्ग जिनकी मृत्यु हो चुकी है उनकी आत्म पृथ्वी पर आती है और अपने परिवार के बीच रहती है। इसलिए पितृ पक्ष में शुभ कार्य करना अच्छा नहीं माना जाता है। माना जाता है कि इस दौरान स्वर्ण और नये वस्त्रों की खरीदारी नहीं करनी चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि पितृ पक्ष उत्सव का नहीं बल्कि एक तरह से पूर्वजनों के प्रति शोक व्यक्त करने का समय होता है। माना जाता है कि नया घर नहीं लेना चाहिए। ऐसा इसलिए कि जहां पितरों की मृत्यु हुई होती है वह अपने उसी स्थान पर लौटते हैं। अगर उनके परिजन उस स्थान पर नहीं मिलते हैं, तो उनको तकलीफ होती है।

सनातन धर्म में मान्यता है कि हमारे जिन संबंधियों का देहावसान हो गया है, जिनको दूसरा शरीर नहीं मिला है वे पितृलोक में अथवा इधर-उधर विचरण करते हैं, उनके लिए पिण्डदान किया जाता है। बच्चों एवं संन्यासियों के लिए पिण्डदान नहीं किया जाता। विचारशील पुरुष को चाहिए कि जिस दिन श्राद्ध करना हो उससे एक दिन पूर्व ही संयमी, श्रेष्ठ ब्राह्मणों को निमंत्रण दे दे। लेकिन श्राद्ध के दिन कोई अनिमंत्रित तपस्वी ब्राह्मण घर पर पधारें तो उन्हें भी भोजन कराना चाहिए। भोजन के लिए उपस्थित अन्न अत्यंत मधुर, भोजनकर्ता की इच्छा के अनुसार तथा अच्छी प्रकार सिद्ध किया हुआ होना चाहिए। पात्रों में भोजन रखकर श्राद्धकर्ता को अत्यंत सुंदर एवं मधुर वाणी से कहना चाहिए कि ''हे महानुभावो .अब आप लोग अपनी इच्छा के अनुसार भोजन करें।

श्राद्ध में मंत्र का बड़ा महत्त्व है। श्राद्ध में आपके द्वारा दी गयी वस्तु कितनी भी मूल्यवान क्यों न हो, लेकिन आपके द्वारा यदि मंत्र का उच्चारण ठीक न हो तो काम अस्त-व्यस्त हो जाता है। मंत्रोच्चारण शुद्ध होना चाहिए और जिसके निमित्त श्राद्ध करते हों उसके नाम का उच्चारण भी शुद्ध करना चाहिए, जिनकी देहावसना-तिथि का पता नहीं है, उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन करना चाहिए।

कौए को पितरों का रूप माना जाता है। मान्यता है कि श्राद्ध ग्रहण करने के लिए हमारे पितर कौए का रूप धारण कर नियत तिथि पर दोपहर के समय हमारे घर आते हैं। अगर उन्हें श्राद्ध नहीं मिलता तो वह रुष्ट हो जाते हैं| इस कारण श्राद्ध का प्रथम अंश कौओं को दिया जाता है।

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