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निजता के अधिकार मामले में दलीलें पूरी, फैसला सुरक्षित

निजता के अधिकार मामले में दलीलें पूरी, फैसला सुरक्षित

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय संविधान बेंच ने निजता के अधिकार मामले पर फैसला सुरक्षित रख लिया है। आज सभी पक्षों की दलीलें पूरी हो गईं। इस मामले में करीब आठ दिनों तक सुनवाई चली। केंद्र की दलील है कि निजता को पूरी तरह से मौलिक अधिकार नहीं माना जा सकता। यूआईडीएआई की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनलर तुषार मेहता ने कहा कि निजता एक महत्वपूर्ण अधिकार है और इसे आधार एक्ट में भी संरक्षण दिया गया है। आधार के जरिए नागरिक को ट्रैक नहीं किया जा सकता है। यहां तक कि अगर कोर्ट अनुमति दे तो भी सरकार इसे सर्विलांस के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकती।


केंद्र की ओर से अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि निजता को पूरी तरह से मौलिक अधिकार नहीं माना जा सकता। सरकार का ये भी कहना है कि निजता के अधिकार के कुछ हिस्सों को मौलिक अधिकारों के तरह संरक्षण दिया जा सकता है। तब कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि आपके हिसाब से किस हिस्से को मौलिक अधिकार माना जा सकता है?

महाराष्ट्र सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील सीए सुंदरम ने कहा कि कोर्ट निजता के अधिकार को संविधान के तहत मौलिक अधिकार के रूप में शामिल नहीं कर सकती है| सिर्फ संसद ही ऐसा कर सकती है। निजता के अधिकार विधायी अधिकार है और ये मौलिक अधिकार नहीं हैं। संसद चाहे तो संविधान में इसके लिए बदलाव कर सकती है। उन्होंने कहा कि निजता धारा 21 के तहत संरक्षण मिला हुआ है।

गुजरात सरकार की ओर से वकील राकेश द्विवेदी ने निजता को मौलिक अधिकार में शामिल करने का विरोध करते हुए कहा कि इसे मौलिक अधिकार में शामिल करने से पहले इसकी अलग से पड़ताल करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार बढ़ जाते हैं जब सूचना सार्वजनिक की जाती है। हर सार्वजनिक की गई सूचना निजता का उल्लंघन नहीं है।

कपिल सिब्बल ने चार राज्यों कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, पंजाब और पुडुचेरी की ओर से दलीलें शुरु करते हुए कहा 1954 और 1962 के सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट में उस तरह कभी विचार नहीं किया जा सकता था जैसी तकनीक आज 21 वीं सदी में मौजूद है। निजता का अधिकार संपूर्ण अधिकार नहीं है और न ही हो सकती है, लेकिन कोर्ट को इसमें संतुलन बनाना है| मैं समझता हूं ये एक खतरनाक क्षेत्र है। निजता का मुद्दा केवल राज्य और नागरिक के बीच का नहीं है बल्कि गैर सरकार और नागरिक के बीच भी है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील अरविंद दातार, आनंद ग्रोवर, सज्जन पोवैया और मीनाक्षी अरोड़ा ने दलीलें पेश करते हुए कहा कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है। अरविंद दातार ने कहा कि निजता तीन हिस्सों में बंटा हुआ है। शारीरिक निजता, सूचना की निजता और निर्णय संबंधी निजता शामिल है। सज्जन पोवैय्या ने कहा कि जिस प्रकार भारतीय ज्योतिष प्रणाली में ग्रह हैं वैसे ही निजता का अधिकार किसी केस में किसी घर में होता है। निजता की अस्वीकृति किसी मामले में स्वतंत्र अभिव्यक्ति की अस्वीकृति हो सकती है। मीनाक्षी अरोड़ा ने बहस शुरु करते हुए 2017 में अधिकारों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। उन्होंने कहा कि धारा 14, 19 और 21 में दिए गए अधिकारों को खत्म मत कीजिए। ये सब जगह मौजूद है। उन्होंने कहा कि धारा 17, 24 और 25 में किसी को अपनी जाति बताने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है। स्वतंत्रता और गरिमा के साथ साथ बराबरी और गैर विभेद के तत्व मौजूद हैं।

चीफ जस्टिस जेएस खेहर इस संविधान बेंच की अध्यक्षता कर रहे हैं और वो 27 अगस्त को रिटायर होनेवाले हैं। लिहाजा 27 अगस्त के पहले इस मामले पर फैसला आ जाएगा।

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