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अटेर में क्या वाकई कांग्रेस जीती है ?

अटेर में क्या वाकई कांग्रेस जीती है ?

यह प्रश्न ही अपने आप में बेतुका सा लगता है। निर्वाचन आयोग की वेब साइट से लेकर राजनीति की सामान्य सी समझ रखने वाला भी यह कहेगा ही हां कांग्रेस ने अटेर में विजय प्राप्त की है। फिर इसके माने क्या यह निकाले जाएं कि लगातार एक के बाद एक उप चुनाव हार रही कांग्रेस का मध्यप्रदेश में विजय रथ प्रारंभ हो गया है? इस सवाल का जवाब कांग्रेस के प्रति नरमी से सोचते हुए भी जब हां कहने पर राजनीतिक पंडित प्रयास करते हैं तो बांधवगढ़ उनकी भावनाओं को बांध लेता है। लगभग 700 किलोमीटर की दूरी पर स्थित प्रदेश के यह दो विधानसभा क्षेत्र बताते हैं कि मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के प्रति विश्वास अभी चुका नहीं है, हां यह अवश्य है कि अटेर में पार्टी ने अनावश्यक रूप से कांग्रेस को इतराने का अवसर जरूर दे दिया।

अटेर में चुनाव का प्रसंग एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना के कारण आया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सत्यदेव कटारे के निधन से यह सीट खाली हुई। देश की जनता भावुक है और वह इस चुनाव में अपने दिवंगत जनप्रतिनिधि को श्रद्धांजलि देगी यह हर कोई जानता था। अपवाद छोड़ दें तो ऐसे मौके पर सहानुभूति लहर हमेशा भारी रही है। यह चुनाव प्रचार के दौरान भी महसूस किया गया। एक बात और ताजा चुनाव नतीजे बताते हैं कि प्रदेश में सीधी टक्कर होने पर भाजपा को परेशानी का सामना करना पड़ा है। जातिगत समीकरण वाले अटेर में बसपा का गैरहाजिर रहना भी कांग्रेस के लिए सुविधाजनक रहा, यह स्पष्ट है। भाजपा नेतृत्व को इससे जरूर सबक लेना होंगे, कारण राष्ट्रीय परिदृश्य देखते हुए बसपा 2018 में वही करेगी जो भाजपा के खिलाफ हो, अत: पार्टी को अटेर से यह पाठ लेना चाहिए।

अब एक बार फिर चर्चा कांग्रेस की

कांग्रेस को यह तय करना चाहिए कि वह इस जीत का श्रेय सहानुभूति लहर को देगी या कांग्रेस की दिखावटी एकता को या फिर ईव्हीएम को और अगर यह सभी को देना चाहेगी तो उसे बताना होगा कि फिर जीत का अंतर 1000 के अंदर क्यों सिमट गया? कारण स्वयं स्वर्गीय सत्यदेव कटारे ने भाजपा की लहर के दौरान लगभग 10,000 वोटों से जीत हासिल की थी। कारण कांग्रेस प्रदेश में शिवराज सिंह का जादू खत्म हो गया है, यह वह साबित करना चाहती है तो फिर क्यों नहीं वह बांधवगढ़ में भी जीती इसका जवाब मांगा जा रहा है? जाहिर है लंबे समय से शोक में डूबी कांग्रेस अटेर से खयाली पुलाव बेशक पकाए पर हकीकत वह भी जानती है। इतना ही नहीं अटेर की जीत के बाद कांग्रेस की एकता का नाटक कितना दिखावटी है, यह इस बात से भी पता चलता है कि स्वयं को मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में प्रस्तुत करवाने के लिए लगभग मन बना चुके ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए किसी बड़े नेता ने अपने स्वर को धार अब तक नहीं दी है। जाहिर है कांग्रेस में नेता कौन होगा, कारण संघर्ष अभी दिल्ली में जारी है।

अटेर के नतीजों ने इस संघर्ष को और धार ही दी है। कारण बेशक अटेर में तकनीकी तौर पर कांग्रेस जीती है। पर सिंधिया विरोधी यह साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं कि अटेर में कांग्रेस नहीं जीती बल्कि भाजपा हारी है, और यह पूरी तरह गलत भी नहीं है।

जहां तक भारतीय जनता पार्टी का प्रश्न है तो यह नतीजे पूरी तरह हताश करने वाले तो नहीं है, सचेत करने वाले अवश्य हैं और ठीक समय पर जनता ने हल्के से उसके कान उमेठे भी हैं। भाजपा को यह विचार करना ही होगा कि आखिर इतनी अनुकूलताओं एवं परिश्रम की पराकाष्ठा के बाद भी परिणाम प्रतिकूल क्यों रहे? क्या पार्टी नेतृत्व समय रहते अपनी निर्णय प्रक्रिया पर गौर करेगा? कारण विगत निकट के इतिहास में अटेर सहित पूरे प्रदेश में ऐसे राजनीतिक निर्णय यदाकदा हो रहे हंै, जो तात्कालिक लाभ के लिए भले ही ठीक दिखाई दें पर पार्टी का प्रतिबद्ध कार्यकर्ता उसे उचित नहीं मान रहा। विचार करना ही होगा कि क्या सिर्फ भितरघात न हो मात्र इसलिए किसी को उपकृत करना उचित है और क्या इसका लाभ होता है? कारण इससे प्रतिवद्ध कार्यकर्ता निराश होता है और वह यह विचार करता है कि क्या पार्टी में स्थान पाने के लिए सौदेबाजी करना भी एक विकल्प है। विचार यह भी करना होगा कि आखिर जब पार्टी अपनी छवि को बेदाग रखने के लिए कठोर निर्णय लेती है, तब मात्र क्षणिक लाभ के लिए ऐसे नेताओं की घर वापसी क्यों? कारण पार्टी के पास प्रत्येक वर्ग में प्रभावी नेता पहले से हंै। भाजपा एक सिर्फ राजनीतिक दल नहीं है। श्रेष्ठ नेतृत्व को चाहिए कि वह पार्टी के मूल विचार को, अनुशासन को, संस्कारों को, न केवल मंचों पर दोहराए अपितु उसे व्यवहार में भी लाने का प्रामाणिक प्रयास करें। सौभाग्य से पार्टी के पास ऐसे तपोनिष्ठ कार्यकर्ता राजधानी से लेकर गांवों की चौपाल तक हैं पार्टी नेतृत्व के पास ऐसी पारखी नजर भी हैं। कारण 2018 में अब ज्यादा विलंब नहीं है। 15 साल सत्ता में रहने के बाद चुनावी मैदान में उतरना आसान नहीं होगा। भाजपा नेतृत्व नि:संदेह यह अनुभव कर रहा होगा कि एक बेहतर संवेदनशील सरकार के बावजूद मैदानी हकीकत कहीं-कहीं चिंताजनक है। संघर्ष सीधा होना है। कांग्रेस के लिए यह चुनाव अस्तित्व के संघर्ष का होगा। अत: वह भी करो या मरो की स्थिति में है। इसलिए अटेर की हार से टूटें नहीं, बांधवगढ़ की जीत से फूलें नहीं, दोनों से सीख लें भविष्य उसका फिर हो सकता है।

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