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लेखन में भारत की छवि को दिखाएं साहित्यकार : पराडकर

डा.माधुरी शुक्ला कथा पुरस्कार से सम्मानित हुर्इं शीला मिश्रा

झांसी। अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्रीधर गोविन्द पराडकर ने कहा कि जिनके सहारे हमारा जीवन चलता है, उनक प्रति हमारी श्रद्धा होना चाहिए। इसी श्रद्धा भाव के कारण ही हमारा भारत देश है। उन्होंने कहा कि साहित्यकारों की जिम्मेदारी है कि वे अपने लेखन के माध्यम से भारत की शाश्वत छवि का दर्शन कराएं, इसके लिए सबसे पहले आधुनिकता का हरा चश्मा उतारना होगा। वे आज बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय व अखिल भारतीय साहित्य परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित डा.माधुरी शुक्ला कथा स्मृति पुरस्कार समारोह एवं व्याख्यान माला को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम मेें भोपाल की कथाकार शीला मिश्रा को प्रथम डा.माधुरी शुक्ला कथा स्मृति पुरस्कार प्रदान किया गया। पुरस्कार स्वरूप उन्हें 11 हजार रूपये प्रदान किए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सुरेन्द्र दुबे ने की तथा विशिष्ट अतिथि के रुप में कथाकार श्रीराम परिहार उपस्थित रहे।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए श्री पराडकर जी ने कथाओं के माध्यम से साहित्यकारों को भारतीय संस्कृति से प्रेरित कथा लिखने को पे्रेरित किया। उन्होंने कहा कि भारत में संबंध प्रगाड़ और आजीवन होते हैं, जबकि अन्य देशों की नकल करके धन्यवाद कहकर रिश्तों को तोडऩे का वर्तमान में किया जा रहा है। भारतीय संस्कृति में संबंध समाप्त नहीं होतेे, वे हमेशा बने रहते हैं। हमें अपने लेखन में संबंधों की प्रगाड़ता को प्रमुखता देना चाहिए। उन्होंने कहा कि जिन व्यक्तियों के कार्यों से प्रेरणा मिलती है और समाज का भला होता है वे प्रात: स्मरणीय होते हैं। जिनके सहारे जीवन को सार्थकता मिलती है, वह श्रद्धा के पात्र होते हैं। जो आज नहीं है, उन्हें स्मरण करें और जो आज हैं उनकों प्रणाम करें। यही भारतीय संस्कृति है। इस अवसर पर उन्होंने कथाओं के माध्यम से यह दर्शाया कि कहानी ऐसी होना चाहिए। जो भारत का हित संवर्धन कर सकती हैं। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के तौर पर उपस्थित ललित कथा के जाने माने कथाकार प्रो.श्रीराम परिहार ने राष्ट्रीय बोध को प्रदर्शित करने वाले लेखन पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि साहित्यकार अपने साहित्य में राष्ट्रीय बोध का समावेश करके लिखें तो वह लेखन राष्ट्र का भला कर सकता है। राष्ट्रहित का लेखन आज की जरुरत है।

उन्होंने राष्ट्रीय जीवन मूल्यों के गिरते स्तर को सुधारने पर बल देते हुए कहा कि अगर हमारे लेखन में राष्ट्र्रीयता नहीं होती तो क्या मंगल पांडे जैसे देशभक्त होते? उन्होंने राष्ट्रीय जीवन मूल्यों की रक्षा के लिए सात बातों को अपनाने की बात कही। जिसमें सत, रित, क्षत्रशक्ति, दीक्षा, तप, ब्रह्मशक्ति और यज्ञ शामिल हैं। उन्होंने इन सात सूत्रों की सुंदर तरीके से व्याख्या की। उन्होंने कहा कि सत्य हमेशा शाश्वत है, जब हम नहीं थे, तब सत्य था, आज भी है और आगे भी रहेगा। देश सत्य का बोध करे।
कार्यक्रम के अध्यक्ष कुलपति प्रो.सुरेन्द्र दुबे ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारत सदैव से चिन्मय है। भारत की अपनी मर्यादाएं रहीं हैं बोध रहा है। हजारों वर्षों की तपस्या के बाद ही भारत में जीवन मूल्यों की स्थापना हुई है। उन्होंने कहा आज भारत में पारिवारिक भावों को बचाने की आवश्कता है। इस भाव के बिना भारत ही नहीं बल्कि विश्व का कोई भी देश विकास नहीं बल्कि विश्व का कोई भी देश विकास नहीं कर सकता। वे कहते हैं कि आज जरूरत इस बात की है कि हम देश के शाश्वत मूल्यों की पहचान करें और उन्हें बचाने के लिए लेखन करें। पश्चिमी दर्शन कहता है कि प्रकृति मनुष्यों के लिए हैं, जबकि भारतीय दर्शन कहता है कि हम प्रकृति के लिए हैं।
इसी कारण हमारे देश में प्रकृति को पूजनीय माना है। कार्यक्रम को कथा पुरस्कार से सम्मानित शीला मिश्रा, डा.मुन्ना तिवारी, पूर्व शिक्षा मंत्री व अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय मंंत्री रवीन्द्र शुक्ल, बीबी त्रिपाठी ने भी संबोधित किया। संचालन डा.पुनीत बिसारिया ने किया। कार्यक्रम के अंत में अतिथियों को स्मृति चिन्ह, शाल व श्रीफल देकर सम्मानित किया गया। इसके बाद वंदेमातरम् का गायन किया। इस अवसर पर महाकवि अवधेश, डा.राम नारायण शर्मा, प्रदीप सरावगी, मदनमानव, गौरीशंकर शुक्ला, अखिलेश त्रिपाठी, केएम श्रीवास्तव, पीएन दुबे, सुमन मिश्रा, डा. सुनील तिवारी, राजेन्द्र शर्मा, डॉ. बाबूलाल तिवारी, दिनेश भार्गव, प्र्रगति शर्मा, अचला पांडेय, सीपी पेन्युली, रामकिशन निरंजन, नरेश शुक्ला, डॉ. वंदना सेन, रूचिर शुक्ला, निशांत शुक्ला आदि उपस्थित रहे आभार दिवाकर विक्रम सिंह ने किया।

क्षेत्र की प्रख्यात साहित्कार डा.माधुरी शुक्ला की स्मृति में हुए कार्यक्रम में जब परिजनों ने स्मृतियां सुनाई, तब कार्यक्रम में उपस्थित लोगों की आंखे भर आईं। इसी बीच माइक पर आकर रवीन्द्र शुक्ला ने घोषणा की कि आगे से यह कार्यक्रम माधुरी शुक्ला के जन्म दिवस 9 अगस्त को हर वर्ष किया जाएगा। जिसमें पुरस्कार भी दिया जाएगा। उल्लेखनीय है कि जब परिजनों ने अपने संस्करण सुनाए, तब परिजन तो गमगीन हो ही गए थे, इसके साथ ही श्रोता भी अपने आंसू पोंछते हुऐ दिखाई दिए।

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