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कुलपति बनने का जो सपना देखा था, वह साकार हुआ

कुलपति बनने का जो सपना देखा था, वह साकार हुआ

-जिस विवि की छात्रा रही, उसी विवि की कुलपति बनीं

ग्वालियर/ प्रशांत शर्मा/ सुजान सिंह बैस|
प्रो. संगीता शुक्ला का नाम आज शहर के नामचीन शिक्षाविदों में शुमार है। उनके जीवन का यह सुखद संयोग ही है कि जिस जीवाजी विश्वविद्यालय की वे छात्रा रहीं, उसी विश्वविद्यालय की वे कुलपति बन गई। वह भी लगातार दूसरी बार। उनका सपना एक बार कुलपति बनने का था, लेकिन ईश्वर ने उन्हें फिर उसी पद पर पहुंचाया है, ताकि वे अपने बीते वर्षों के अधूरे कार्यों को न सिर्फ पूरा कर सकें। वरन् इस विश्वविद्यालय का नाम देश के चुनिंदा विश्वविद्यालयों में शामिल करा सकें। कुलपति बनने तक की राह यूं भी इतनी आसान नहीं होती। लेकिन तमाम विरोधों-अवरोधों के बावजूद वे कुलपति की कुर्सी पर विराजमान हैं। समस्याओं से डरती नहीं हैं बल्कि डट कर मुकाबला करती हैं और फिर भी परिणाम ठीक न निकले तो सब कुछ ईश्वर पर छोड़ देती हैं। शहर की दबंग, खुश मिजाज एवं अत्यंत व्यवहार कुशल प्रो.संगीता शुक्ला शहर के प्रतिष्ठित एवं पढ़े लिखे परिवार से हैं। कुलपति प्रो. शुक्ला की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे छात्रों के बीच छात्रों जैसी हो जाती हैं ताकि छात्र अपनी बात खुलकर कह सकें। यही खासियत उन्हें एक शख्सियत बनाती है। स्वदेश से एक चर्चा के दौरान उन्होंने अपने जीवन के कुछ अंश साझा करते हुए बताया कि वह एक संपन्न और प्रतिष्ठित परिवार से ताल्लुक रखती हैं। भरा- पूरा परिवार होने के कारण सभी सदस्य उच्च शिक्षित हैं। कुलपति बनने के लिए आवश्यक प्रोफेसर शिप पूरी करने के बाद उन्हें ये पद सौंपा गया था। प्रोफेसर के साथ-साथ विवि से जुड़ी अन्य कई गतिविधियों में शामिल होने व उनकी जानकारी होने के कारण उन्हें यह पद मिला है। ग्वालियर की रहने वाली प्रो. संगीता शुक्ला की विद्यालय व महाविद्यालयीन शिक्षा अपने गृह नगर में ही हुई है। उनके दादा रामेश्वर शास्त्री शहर के जाने माने वैद्य थे। पिता रामचन्द्र शुक्ला अभिभाषक रहे और मां कांति शुक्ला कुशल ग्रहणी हैं। प्रो. संगीता शुक्ला का मानना है कि आत्मविश्वास से ही श्रेष्ठ मुकाम तक पहुंचा जा सकता है।

जो चीज मुझसे नहीं संभलती, उसे भगवान पर छोड़ती हूं

प्रो संगीता शुक्ला ने कहा कि ऐसा कोई इंसान नहीं होता जिसे जीवन में परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ता हो। मैंने भी कई परेशानियों का सामना किया है। मैं कभी परेशानियों से दूर नहीं भागती, बल्कि मैं सभी परेशानियों का डटकर मुकाबला करती हूं। जिस समस्या का मुझसे निराकरण नहीं होता है उसे मैं सिर्फ भगवान के ऊपर छोड़ देती हूं, और भगवान ने मेरी सभी परेशानियों को बड़ी आसानी से हल किया है। उन्होंने दूसरे कार्यकाल का उदाहरण देते हुए कहा कि मैनें दूसरे कार्यकाल को लेकर कई परेशानियों का सामना किया, लेकिन मैं कभी पीछे नहीं हटी।

डिजिटल लाइजेशन को देंगे प्राथमिकता

कुलपति की कुर्सी पाने की दौड़ में जेयू के ही कई प्रोफेसर दौड़ में थे। इनमें से कुछ ने तो प्रो. संगीता शुक्ला को दोबारा कुलपति बनने से रोकने के लिए मोर्चा खोल रखा था। इस सबके बावजूद वे दोबारा कुलपति बनने में सफल रहीं। उन्होंने दूसरे कार्यकल को लेकर कहा कि वह जीवाजी विवि को डिजिटल लाइजेशन करेंगी। जीवाजी विवि में शिक्षकों की बहुत ज्यादा कमी है। इसीलिए हम रैकिंग में नहीं आ पा रहे हैं। हमने शासन से शिक्षकों के पद भरने का आग्रह किया है। अगर विवि में शिक्षकों की कमी दूर होती है तो विवि और उन्नति करेगा। वहीं विवि में इन्फ्रास्ट्रक्चर पहले से काफी डवलप हुआ है।

माता- पिता ने सिखाया कठिन परिश्रम करना

प्रो. संगीता शुक्ला का जन्म 11 जुलाई 1961 को लाला के बाजार में हुआ था। संगीता शुक्ला ने ग्वालियर के कॉर्मल कॉन्वेंट स्कूल के बाद पूरी शिक्षा जीवाजी विवि से ग्रहण की है। संयुक्त परिवार में आठ भाई व 6 बहने हैं। मां कांति शुक्ला ने सभी बहनों को बड़े लाड़ -प्यार से पाला व हमेशा साथ दिया। प्रो. संगीता शुक्ला ने बताया कि वह संयुक्त परिवार में पली बढ़ी हैं और उनके माता- पिता ने उनकी हर इच्छा को पूरा करने में उनका साथ दिया।

मधुबाला की फिल्म देखना पसंद

बचपन से ही पढ़ाई में गंभीर रहने वाली प्रो. संगीता शुक्ला को सन् 1970 के दशक की फिल्में देखना पसंद हैं। खासकर अभिनेत्री मधुवाला व माधुरी दीक्षित की फिल्में। प्रो. संगीता शुक्ला भारत के पूर्व राष्टÑपति स्व.डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के विचारों से काफी प्रभावित हैं।

पहले से अच्छी है महिलाओं की स्थिति

आज महिलाओं की दशा पहले से काफी अच्छी है। महिलाएं आज हर क्षेत्र में आगे आकर भाग ले रही हैं। पहले ऐसा नहीं होता था, पहले महिलाएं सिर्फ शिक्षक ही बनती थीं। लेकिन अब महिलाएं इंजीनियरिंग, पुलिस, अकाउंटेंट, मेडीकल सहित सभी क्षेत्रों में आगे आकर भाग ले रही हैं। इसीलिए पहले से अब महिलाओं की स्थिति अच्छी हुई है। लेकिन महिलाओं की आज जो स्थिति होना चाहिए वह नहीं है, क्योंकि आज भी लड़कियां स्कूल पढ़ने के बाद पढ़ाई छोड़ देती हैं। यही महिलाओं का सबसे बड़ा निगेटिव पॉंइट है। हमें लड़कियों को उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित करना चाहिए।

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