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तानसेन समारोह की घटती गरिमा

तानसेन समारोह की घटती गरिमा

तानसेन संगीत समारोह भारत में आयोजित होने वाले सबसे पुराने और प्रतिष्ठित संगीत समारोहों में से एक है। प्रति वर्ष यह समारोह संगीत सम्राट तानसेन के समाधि स्थल और उनकी जन्मस्थली बेहट में मनाया जाता है। बेहट ग्वालियर से 40 किमी दूर है। चार दिवसीय यह समारोह तीन दिन मोहम्मद गौस के मकबरे के नजदीक स्थित तानसेन की समाधि पर मनाया जाता रहा है और एक दिन ग्राम बेहट में आयोजित होता है। किंतु अब पुरातत्व विभाग की अप्रत्याशित आपात्तियों के चलते ग्वालियर के ही कलावीथिका भवन में मनाया जाने लगा है। इस आयोजन का प्रबंधन और संचालन मध्य प्रदेश सरकार का संस्कृति विभाग देखता है। हिन्दुस्तानी या भारतीय शास्त्रीय संगीत के लिए दुनिया भर में मशहूर इस कार्यक्रम का इतना ज्यादा सरकारीकरण हो गया है कि अब तानसेन की स्मृति में गायन के लिए जिन महान गायकों को आमंत्रित किया जाता है, एक तो उनके गायन की समय सीमा निर्धारित कर दी जाती है, दूसरे उनको खुलकर गाने नहीं दिया जाता है। पहले गायक जब सुर की साधना में लीन हो जाता था, तो प्रभु और प्रकृति को समर्पित धुन की तान सूर्योदय को समर्पण के साथ ही थमती थी। गोया, अब समारोह का बाहरी स्वरूप तो भव्य हुआ है, किंतु इसकी दिव्यता का लोप होता जा रहा है। कमोबेश यही हश्र संगीत सम्राट तानसेन की याद में दिए जाने वाले अलंकरण का हो गया है।
तानसेन के नाम पर बनने वाला बहुउद्देशीय संस्कृति परिसर साढ़े तीन करोड़ रुपये खर्च कर दिए जाने के बावजूद 9 साल में भी अधूरा है। इससे पता चलता है कि संगीत की इस महान विरासत को सुरक्षित रखने में सरकार कितनी लापरवाही बरत रही है।

तानसेन मुगल सम्राट अकबर के दरबारी गायक भले ही रहे हों, लेकिन उनका शास्त्रीय गायन मौलिक होने के साथ विश्‍व प्रसिद्ध है। इसीलिए अकबर के इस नवरत्न की प्रसिद्धि अकबर से कहीं ज्यादा है। वैसे भी किसी राज्य की सीमाएं होती हैं, लेकिन जब कोई गायक अपने वाद्य यंत्र के साथ धुन की लय में तल्लीन हो जाता है तो उसकी स्वर लहरियां सीमाओं का उल्लंघन कर अनंत में फैल जाती हैं। शायद इसीलिए कहते हैं कि जब तानसेन दीपक राग गाते थे, तो दीपक की बातियां तानसेन की तान से ऊर्जा ग्रहण कर अनायास ही जल उठती थीं। शास्त्रीय संगीत के गायन का यही वह चरम है, जो शास्त्रीय संगीत का अलौकिक दिव्यता से मेल कराता है।

इस अद्वितीय संगीतकार का जन्म ग्वालियर से लगभग 45 किमी दूर ग्राम बेहट में 1493 में हुआ था। हालांकि विद्वानों के बीच मतभेद होने के कारण कई विद्वान उनका जन्म 1506 में होना मानते हैं। इनके पिता का नाम मकरंद पाण्डेय था। आरंभ में तानसेन का नाम रामतनु मिश्र था। किंतु संगीत के प्रति इनकी लगन के कारण इनका नामाकरण तानसेन हो गया। जब ये अकबर के नवरत्नों में शुमार हो गए तो इन्हें मियां तानसेन के नाम से भी पुकारा जाने लगा। हालांकि तानसेन का आरंभिक जीवन ग्वालियर के कलाप्रिय राजा मानसिंह तोमर के शासनकाल में बीता। मानसिंह के समय में ग्वालियर संगीतकला के क्षेत्र में विख्यात था। यहां अनेक गायकों और संगीताचार्यों को अपनी प्रतिभा को विकसित करने का उन्मुक्त वातावरण मिलता था। इसीलिए यहां पर तानसेन के अलावा बैजूबावरा, कर्ण और महमूद जैसे संगीतकार व गायक इकट्ठे होकर शास्त्रीय गायन की नई-नई शैलियों के अनुसंधान में लगे रहते थे। यहां संगीत की उच्च शिक्षा भी दी जाती थी। राजा मानसिंह ने कई गायकों के साथ मिल-बैठकर ध्रुपद गायकी का आविष्‍कार किया और उसे बड़े-बड़े संगीत के मंचों पर गाकर प्रचारित भी किया। तानसेन की शिक्षा एवं दीक्षा इसी परिवेश में हुई थी, इसीलिए वे कालांतर में ध्रुपद गायकी में सिद्धहस्त हुए। राजा मानसिंह तोमर की मृत्यु हो जाने के बाद उनके, वंशज विक्रमजीत सिंह तोमर राज्य की सीमाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाए, नतीजतन मुगल सम्राट अकबर की आक्रामकता ने ग्वालियर राज्य पर ग्रहण लगा दिया और विक्रमजीत से ग्वालियर की सत्ता छीन ली। मुगल शासन के इस विस्तार के बाद ग्वालियर राज्य में संगीत की परंपरा ठहर गई और तानसेन जैसे संगीत सम्राट को भी ग्वालियर छोड़ना पड़ा।

तानसेन ग्वालियर से वृंदावन गए और वहां स्वामी हरिदास से संगीत की उच्च शिक्षा प्राप्त की। तानसेन ने कुछ समय शेरशाह सूरी के पुत्र दौलत खां के आश्रय में भी बिताया। किंतु यहां वे ज्यादा दिन टिक नहीं पाए। फलस्वरूप तानसेन ने बांधवगढ़ (रीवा) के राजा रामचंद्र के दरबारी गायक की नौकरी प्राप्त कर ली। यहां से उनकी गायकी की गूंज अकबर के कानों में गूंजी और अकबर ने उन्हें अपने दरबार में बुलाकर नवरत्नों में स्थान दे दिया। हालांकि राजा रामचंद्र तानसेन को छोड़ना नहीं चाहते थे और तानसेन भी जाने के इच्छुक नहीं थे, लेकिन सम्राट के हुक्म पर अमल के लिए दोनों विवश थे।
तानसेन दरबारी गायक जरूर थे, लेकिन इस दरबारी परिवेश में भी उनकी रचना प्रक्रिया अनवरत जारी रही। इसीलिए वे ‘ दरबारी कान्हड़ा‘, ‘गूजरी टोड़ी‘, मियां की टोड़ी और ‘मियां का मल्हार‘ जैसे रागनियां रच पाए। संगीत की परंपरा निरंतर बनी रहे, इस हेतु तानसेन ने ‘संगीत-सार‘, ‘राग-माला‘ और ‘श्री गणेश-स्तोत्र‘ जैसे मानक ग्रंथों की रचना भी की। ब्रज भाषा के पदसाहित्य का संगीत के साथ जो अटूट संबंध रहा है, उसमें भी तानसंन का योगदान उल्लेखनीय माना जाता है। भारतीय संगीत के इतिहास में ध्रुपद गायक के रूप में तानसेन का नाम अग्रणी गायकों में है। तानसेन का जन्म वर्ष जिस तरह से विवाद में है, उसी तरह उनकी मृत्यु का समय भी निर्विवाद नहीं है। कई विद्वान उनकी मृत्यु 1586 में होना मानते हैं तो कई 1589 में ? अद्वितीय सृजनधर्मी तानसेन के जन्म और मृत्यु की तिथि भले ही विवादों में हो, लेकिन उनके द्वारा प्रदत्त संगीत की थाती निर्विवाद और निरंतर बनी हुई है। यह समारोह तानसेन के गुरु गौस मोहम्मद खां के मकबरे के निकट इसलिए मनाया जाता रहा है, क्योंकि उनकी मृत्यु के बाद उनकी इच्व्छापूर्ति के लिए तानसेन का अंतिम संस्कार गौस के मकबरे के निकट किया गया था।

लंबे समय तक तानसेन समारोह ग्वालियर के स्थानीय संगीत और साहित्य के प्रेमी ही मनाया करते थे, लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 1952 से 1962 तक भारत सरकार में प्रसारण मंत्री रहे बीवी केस्कर की पहल पर इस समारोह का आयोजन का स्वरूप विस्तृत हुआ और इसका आकाशवाणी पर प्रसारण भी शुरू होने लगा। इससे इस समारोह में बदलाव आया और इसे राष्‍ट्रीय संगीत उत्सव के रूप में मनाया जाने लगा। कालांतर में मध्य प्रदेश सरकार का संस्कृति मंत्रालय शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में अमूल्य योगदान के लिए किसी न किसी प्रतिष्ठित शास्त्रीय गायक को तानसेन सम्मान से अलंकृत भी करने लगा। 2017 का यह सम्मान शास्त्रीय संगीत के सुप्रतिष्ठित गायक उल्लास कशालकर को दिया जाएगा। इस अलंकरण से विभूषित गायक को दो लाख रुपये की आयकर मुक्त राशि, सम्मान पट्टिका, शॉल, श्रीफल भेंट किए जाते हैं। 22 से 24 दिसंबर तक चलने वाले इस समारोह में पंडित कशालकर को 22 दिसंबर को सम्मानित किया जाएगा। सरकारी नियंत्रण में यह कार्यक्रम कई दशकों से निरंतर है, लेकिन इस पर अफसरशाही इतनी हावी हो गई है कि एक तो गायकों का समय निर्धारित कर दिया गया है, दूसरे इसको खर्चीली भव्यता की चकाचौंध में इतना सराबोर कर दिया जाता है कि संगीत की स्वर लहरियां चकाचौंध में गुम हो जाती हैं। तानसेन सम्मान की विश्‍वसनीयता भी कठघरे में है। किस गायक को अलंकरण से विभूषित करना है, इसका अंतिम निर्णय नौकरशाही के वे लोग लेते हैं, जिनका संगीत और उसमें भी शास्त्रीय संगीत से कोई लेना-देना नहीं है। यही कारण है कि इस समारोह की गरिमा उत्तरोत्तर घट रही है।

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