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राष्ट्र सांस्कृतिक इकाई तो देश राजनीति व्यवस्था का प्रतीक होता है: पराडकर

राष्ट्र सांस्कृतिक इकाई तो देश राजनीति व्यवस्था का प्रतीक होता है: पराडकर

माधव महाविद्यालय में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय शोध संगोष्ठी प्रारंभ



ग्वालियर । राष्ट्र और देश दो अलग-अलग चीजें हैं। राष्ट्र एक सांस्कृतिक इकाई होता है, जबकि देश राजनीति व्यवस्था का प्रतीक। नेशनल्टी का अर्थ नागरिकता से है, राष्ट्रीयता से नहीं। देश के महापुरुषों, इतिहास, परम्पराओं और आपसी संबंधों से ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का निर्माण होता है। यह बात महाविद्यालय के संस्थापक प्राचार्य डॉ. श्रीधर गोपाल कुंटे के जन्म शताब्दी वर्ष में माधव महाविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा शनिवार को ‘राष्ट्रवाद की संकल्पना और उसके विविध परिदृश्य’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय शोध संगोष्ठी में मुख्य वक्ता की आसंदी से बोलते हुए अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्रीधर पराड़कर ने कही। कार्यक्रम की अध्यक्षता मध्य भारत शिक्षा समिति के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ शिक्षाविद् डॉ. राजेन्द्र बांदिल ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में बेल्जियम की विदुषी सुश्री जेरडा स्टेस उपस्थित थीं।

श्री पराड़कर ने कहा कि देश में आज राष्ट्रवाद को लेकर भ्रम और विवाद की स्थिति बनी हुई है। ऐसा लगता है जैसे राष्ट्रवाद की बात करना एक अपराध है। ऐसे में राष्ट्रवाद पर चर्चा करना निश्चित रूप से साहस का विषय है। अपने व्यक्तव्य से संगोष्ठी की दिशा निर्धारित करते हुए श्री पराड़कर ने कहा कि राष्ट्रवाद एक स्वाभाविक इकाई है। इसे जोड़-तोड़ कर नहीं बनाया जा सकता। जिस तरह विभिन्न व्यक्तियों को एकत्रित करके एक मकान में बैठा देने से परिवार नहीं बन सकता, उसी प्रकार विभिन्न स्थानों को जोड़कर राष्ट्र तैयार नहीं हो सकता। जो हमारे अंदर है, वही हमारी संस्कृति है और यही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मूल का भाव भी है। उन्होंने कहा कि सर्वे भवन्तु सुखिन: का मूल मंत्र ही राष्ट्रवाद का परिचायक है। श्री पराड़कर ने कहा कि राष्ट्र की संकल्पना को छोड़ने का अर्थ है अपनी मान्यता, पुरखे व जीवन मूल्यों को भूल जाना। यदि हम अपने जीवन मूल्यों को ही भुला देंगे तो हमारा विकास कैसे होगा।

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में शिक्षाविद् डॉ. राजेन्द्र बांदिल ने कहा कि भारत जीता-जागता राष्ट्र पुरुष है। भारत माता का वर्णन सुनते-सुनते रोमांच अनुभव करना ही राष्ट्रीयता है। हमें राष्ट्र की आत्मा को पहचानना चाहिए, जो हमारे भाव से निर्मित होती है। प्रारंभ में कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा मां सरस्वती की प्रतिमा पर पुष्पहार एवं स्व. डॉ. श्रीधर गोपाल कुंटे के चित्र पर माल्यार्पण तथा दीप प्रज्जवल के साथ हुआ। सरस्वती वंदना व स्वागत गीत सरस्वती शिशु मंदिर नदी द्वार की बहनों द्वारा प्रस्तुत किया गया। प्राचार्य डॉ. प्रदीप वाजपेयी ने स्वागत भाषण दिया तथा माल्यार्पण से अतिथियों का स्वागत किया। इस अवसर पर डॉ. आर.के. गुप्ता द्वारा संपादित ‘शोध यात्रा’ शोध पत्रिका का अतिथियों द्वारा विमोचन किया गया।

बच्चों को मातृ भाषा में दी जाए शिक्षा: सुश्री जेरडा

बेल्जियम से आर्इं विशिष्ट अतिथि सुश्री जेरडा स्टेस ने कहा कि मैं देखती हंंू कि भारत में अधिकांश लोग आपसी वार्तालाप में अंग्रेजी के शब्दों का उपयोग करते हैं, जबकि हमारे देश में ऐसा नहीं है। हमारे देश में कोई भी व्यक्ति आपसी वार्तालाप में अपनी मातृ भाषा के अलावा किसी अन्य भाषा का उपयोग नहीं करता है। उन्होंने कहा कि हम अपने भाव अपनी मातृभाषा में ही प्रकट कर सकते हैं। यह एक वैज्ञानिक सत्य है, इसलिए मेरा मानना है कि हमें अपने बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा अपनी मातृ भाषा में ही दिलाना चाहिए। मातृ भाषा के माध्यम से ही हम अपने विचारों को दूसरों तक पहुंचा सकते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि गतवर्ष यू.पी. बोर्ड की हिन्दी परीक्षा में सबसे अधिक विद्यार्थियों का असफल होना इस बात का द्योतक है कि हम हमारी भाषा व स्वभाव को भूलते जा रहे हैं।


डॉ. जेऊरकर का किया सम्मान

कार्यक्रम में सांगली महाराष्ट्र से आए वरिष्ठ अनुवादक एवं मराठी साहित्यकार डॉ. बलवंत जेऊरकर को ‘स्व. डॉ. श्रीधर गोपाल कुंटे सम्मान’ से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त हिन्दी की सेवा के लिए सतत् समर्पित श्रीधर पराड़कर, बेल्जियम से आर्इं सुश्री जेरडा स्टेस, क्रोएशिया से आर्इं सुश्री एन्ना एवं इटली की सुश्री मारिया को भी सम्मानित किया गया। अंत में प्राचार्य डॉ. प्रदीप वाजपेयी ने अतिथियों को स्मृति चिन्ह भेंट किए। कार्यक्रम का संचालन संगोष्ठी के आयोजन सचिव एवं हिन्दी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. शिवकुमार शर्मा ने तथा आभार प्रदर्शन डॉ. सरिता दीक्षित ने किया। द्वितीय दिवस रविवार 17 दिसम्बर को सुबह नौ से दोपहर 12 बजे तक ग्वालियर दर्शन के तहत देश भर से आए विद्वानों को ग्वालियर के ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण कराया जाएगा। इसके बाद मध्यान्ह तीन से शाम पांच बजे तक चतुर्थ तकनीकी एवं समापन सत्र चलेगा।


विद्वानों ने विभिन्न विषयों पर प्रस्तुत किए शोध-पत्र

संगोष्ठी के प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय सत्रों में पर्यावरण व राष्ट्रवाद, राष्ट्रवाद बनाम समाजवाद, क्रांतिकारी आंदोलन और आधुनिक हिन्दी कविता, राष्ट्रवाद के ऐतिहासिक संदर्भ एवं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद आदि विभिन्न विषयों पर शोध-पत्र पढे़ गए। शोध-पत्र पढ़ने वालों में प्रमुख रूप से डॉ. लता चौहान बैंगलोर, डॉ. अनिल विश्वकर्मा लखनऊ, डॉ. आरती राजेश पाण्डेय उरई, अमिताभ अग्निहोत्री पीलीभीत, डॉ. सतीश चतुर्वेदी गुना, डॉ. जगदीश शर्मा मथुरा, डॉ. नीरा गर्ग सोनीपत, डॉ. नरेन्द्र मिश्र जोधपुर, डॉ. अरुण चतुर्वेदी पिथौरागढ़, डॉ. गोविन्द सिरसमटे बालाघाट, डॉ. राजेश चतुर्वेदी बिलासपुर, डॉ. शशि अवस्थी मुरैना, डॉ. प्रणव शास्त्री पीलीभीत, डॉ. सजीत एस. जे. शशि केरला, डॉ. राजेश पाण्डेय उरई आदि शामिल थे। इस अवसर पर डॉ. राजरानी शर्मा, डॉ. उर्मिला तोमर, डॉ. भगवान स्वरूप चैतन्य, नरेन्द्र कुंटे, डॉ. शिखा मिश्रा, डॉ. गजेन्द्र भारद्वाज, डॉ. रविकांत अदालतवाले, डॉ. आलोक गर्ग, डॉ. दिवाकर विद्यालंकार, डॉ. राजेन्द्र वैद्य, चन्द्रप्रताप सिंह सिकरवार, डॉ. लखनलाल खरे, डॉ. मनोज चतुर्वेदी, डॉ. मनीष खेमरिया आदि उपस्थित थे।

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