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ब्लाउज जैसा टैटू बनवाती हैं लड़कियां

ब्लाउज जैसा टैटू बनवाती हैं लड़कियां

-बुरी नजर से बचने का तरीका

रायपुर।
टैटू (गोदना) बनवाना आज भले ही फैशन बन चुका हो, लेकिन छत्तीसगढ़ के इन आदिवासियों के लिए ये जरूरी प्रथा है। सदियों से चली आ रही इस प्रथा के पीछे जो कहानी यहां बताई जाती है वो चौंकाने वाली है। दरअसल, यहां के लोगों ने अपनी बेटियों को राजा से बचाने के लिए उनकी छाती और पीठ पर ब्लाउज जैसा टैटू (गोदना) गुदवाना शुरू कर दिया।

एक नवंबर को छत्तीसगढ़ अपना स्थापना दिवस मनाने जा रहा है। यहां बसने वाले आदिवासी कम्युनिटी की अपनी कल्चर, मान्यताएं और परंपराएं हैं। इस मौके पर बता रहा है यहां की कही अनकही कहानियों के बारे में इसी कड़ी में आज पढ़िए टैटू की असली कहानी।

बैगा आदिवासियों की लड़कियों को 12 से 20 साल में गोदना गुदवाना जरूरी है। शरीर के कुछ खास हिस्सों में गोदना गोदा जाता है। इस प्रोसेस में होने वाले दर्द को बर्दाश्त करने के लिए बुजुर्ग महिलाएं लड़की को साहस देती हैं।

अलग-अलग उम्र में शरीर के अलग-अलग हिस्सों में गोदना गुदवाया जाता है। शुरूआत माथे से होती है। उसके बाद पैर, जांघ और हाथ के अलावा चेहरे की बारी आती है। सबसे आखिर में पीठ पर इसे गुदवाया जाता है। गोदना गोदने वाली महिला को बदनीन कहते हैं। जिस घर में लड़की का गोदना बन रहा होता है वहां पुरुषों का प्रवेश वर्जित होता है। ऐसी मान्यता है कि यदि गलती से भी किसी पुरुष ने ये प्रक्रिया देख ली तो वो पूरे जीवन सांभर का शिकार नहीं कर सकता।

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