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हिरण वन कोठी का रिसीवरों ने लिया कब्जा

हिरण वन कोठी का रिसीवरों ने लिया कब्जा

*सिंधिया और चित्रलेखा में चल रहा है मालिकाना हक को लेकर विवाद
*उच्च् न्यायालय के निर्देश के बाद की कार्रवाई वीडियोग्राफी के साथ 18 जनवरी को रिपोर्ट न्यायालय में करेंगे पेश


ग्वालियर।
शहर की बहुचर्चित हिरण वन कोठी के मालिकाना अधिकार को लेकर ज्योतिरादित्य सिंधिया और स्व.संभाजी राव आंग्रे की पुत्री चित्रलेखा के बीच सालों से चल रहा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। शनिवार को उच्च न्यायालय के आदेश के बाद करोड़ों रुपए कीमत की हिरण वन कोठी का कब्जा उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त किए गए रिसीवरों ने ले लिया। इस दौरान दो घंटे तक न्यायालय रिसीवरों ने पूरी हिरण वन कोठी की वीडियोग्राफी कराई और समूची कोठी का सूक्ष्मता से निरीक्षण करने के बाद जांच में पाया कि कोठी की हालत जीर्ण-शीर्ण हैं और कोठी ताला लगाने की स्थिति में नहीं है क्योंकि कोठी में ऐसा कुछ भी नहीं है जो सही हालत में हो। इस पूरी कार्रवाई को दोनों रिसीवर 18 जनवरी को उच्च न्यायालय में प्रस्तुत करेंगे। इसके बाद उच्च न्यायायल अपना निर्णय देगी।

उच्च न्यायालय ने सिंधिया पक्ष से टीसी नरवरिया और चित्रलेखा के पक्ष से एसएस कुशवाह को रिसीवर नियुक्त किया है। यहां बता दें कि 1984 में न्यायालय ने विवाद बढऩे पर अधिवक्ता केएन गुप्ता को रिसीवर घोषित किया था। जोकि 2004 तक रिसीवर रहे। 2005 में चित्रलेखा निचली अदालत से मामला जीत गईं थी,लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया ने उच्च न्यायालय में हिरण वन कोठी के अधिकार को लेकर याचिका प्रस्तुत की थी। तब से लेकर अब तक विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है।

कोठी में दरगाह मिली
दोनों रिसीवरों को हिरण वन कोठी के निरीक्षण के दौरान अवैध दरगाह भी मिली। दोनों रिसीवरों ने इसके बारे में जब दोनों पक्ष के अधिवक्ताओं से पूछा तो उन्होंने भी अनभिज्ञता जाहिर की। दरगाह में बाकायदा बिजली कनेक्शन था। जबकि पूरी कोठी में कहीं भी बिजली का बोर्ड या अन्य साकेट नहीं था। पंचनामा बनाते समय इसका भी उल्लेख रिसीवरों ने किया।

मुख्य दरवाजे पर दोनों रिसीवरों ने लगाया ताला
कोर्ट रिसीवरों ने समूची हिरण वन कोठी का पंचनामा व वीडियोग्राफी कराकर निरीक्षण किया तो देखा कि कोठी की हालत खंडहर है और कब्जा लेने लायक स्थिति में नहीं है। दोनों रिसीवरों को चित्रलेखा के अधिवक्ता दीपक खोत और सिंधिया के अधिवक्ता अंकुर मोदी ने हिरण वन कोठी की वास्तुस्थिति से अवगत कराया। इसके बाद हिरण वन कोठी के बसंत विहार की तरफ वाले मुख्य दरवाजे पर अंदर और बाहर की तरफ से दोनों रिसीवरों ने अपना-अपना ताला लगाया। इससे पहले 2002 में उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त रिसीवर ने कोठी का निरीक्षण किया था।

स्व. सिंधिया पर डकैती का मामला दर्ज हुआ था
बताया जाता है कि 1983 में माधवराव सिंधिया और उनके सिपहसालर संभाजीराव आंग्रे में हिरण वन कोठी के मालिकाना अधिकार को लेकर विवाद चल रहा था। कोठी सरदार संभाजीराव आंग्रे का निवास थी। सरदार आंग्रे का पूरा परिवार विदेश में रहने चला गया तो इस पर कब्जा कर लिया गया। इसके बाद विवाद शुरू हुआ। वर्ष 1983 में ही सरदार आंग्रे की पुत्री चित्रलेखा ने झांसी रोड थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि स्व.माधवराव सिंधिया के साथ उनके डेढ़ दर्जन से ज्यादा समर्थकों ने हिरण वन कोठी पर रात के समय हमला बोला और वहां तैनात कुत्तों की हत्या करके कोठी में रखा कीमती माल लूट लिया। इसके बाद माधवराव सिंधिया ने कोठी में ताले लगा दिए। पुलिस ने स्व. माधवराव सहित अन्य लोगों पर डकैती अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया था। इस मामले में बाद में डकैती का मामला न्यायालय ने हटा दिया था। चित्रलेखा के अधिवक्ता ने बताया कि सिंधिया राजवंश ने सरदार परिवार को हिरण वन कोठी रहने के लिए दी थी। इसके मालिक सिंधिया ही हैं,लेकिन डिक्री चित्रलेखा के पास है।

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