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कैराना, कांधला और कानून व्यवस्था

कैराना, कांधला और कानून व्यवस्था


डॉ. दिलीप अग्निहोत्री

इसमें कोई संदेह नहीं कि भाजपा सांसद हुकुम सिंह को कैराना विस्थापितों की सूची को प्रमाणित करने के बाद जारी करना चाहिए था। पलायन करने वालों की संख्या, समय व कारण में भिन्नता हो सकती है। हुकुम सिंह ने अपनी यह चूक स्वीकार भी की है। लेकिन मामला इतना सामान्य भी नहीं है, जितना गैर भाजपा पार्टियां बताने का प्रयास कर रही हैं। खासतौर पर वामपंथी, जद(यू) नेताओं का यहां पहुंचना आशंका प्रकट करता है। यदि इन्हें कैराना में वोट बैंक की राजनीति न दिखाई देती तो वह इतनी जहमत न उठाते। याद कीजिए ये वही नेता थे जो जेएनयू में देश विरोधी नारे बुलन्द करने वालों के बचाव में तत्काल दौड़ पड़े थे। ऐसी ही तत्परता इन्होंने कैराना मामले में दिखाई। कहने को वामपंथी, जद(यू) और कांग्रेस के नेता कैराना में सर्वेक्षण करने आये थे। लेकिन दिलचस्प पहलू यह था कि इन्होंने कैराना आने से पहले नई दिल्ली में जो बयान दिया था, उसी को कथित सर्वेक्षण के बाद कैराना में भी दोहरा दिया। ये कितने लोगों से मिले, क्या बात हुई इसका कोई प्रमाण नहीं, लेकिन पूरे आत्मविश्वास के साथ इन्होंने मामले को साम्प्रदायिक बता दिया। कहा कि साम्प्रदायिक आधार पर कोई पलायन नहीं हुआ। इनका आत्मविश्वास बिल्कुल ऐसा था जैसा जेएनयू में दिखाई दिया। बाद में प्रमाणित हुआ कि ये सभी नेता देश विरोधी नारे लगाने वालों को अभिव्यक्ति का अधिकार दिलाने गये थे। इन्हें लगता है कि ऐसे कदम इनकी धर्मनिरपेक्षता के दावे को मजबूत बनाते हैं।

जेडी(यू) के के.सी. त्यागी, कम्युनिस्ट पार्टी के डी. राजा, माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मोहम्मद सलीम, राष्ट्रवादी कांग्रेस के डीपी त्रिपाठी और राजद के मनोज झा ने एक-दो घंटे में ही कैराना, कांधला का सर्वेक्षण भी कर लिया और रिपोर्ट भी जारी कर दी। ये सभी नेता दिल्ली से आये थे। राष्ट्रीय स्तर पर खूब चर्चा मिली। कांग्रेस ने अलग से अपना प्रतिनधि मण्डल भेजा। समाजवादी पार्टी की ओर से वरिष्ठ मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने मोर्चा संभाला। इनकी विशेष टीम भी क्या रिपोर्ट दे सकती थी, इसका पहले से ही अनुमान लगाया जा सकता था। वैसे भाजपा विधायक संगीत सोम की निर्भया यात्रा का भी कोई औचित्य नहीं था। प्रदेश संगठन ने उन्हें इसकी अनुमति भी नहीं दी थी। इस प्रकार की यात्राएं स्थानीय लोगों में आत्मविश्वास उत्पन्न नहीं करती है। वह जानते हैं कि यात्रा में चलने वाला हुजूम यहां से चला जाएगा, लेकिन स्थानीय लोग फिर अपने ही हाल पर रहने को बाध्य होंगे।

बसपा प्रमुख मायावती भी पीछे कैसे रहतीं। उन्होंने कहा कि कैराना, कांधला में भाजपा और सपा की मिली भगत है। दोनों दंगा कराना चाहती हैं। मायावती के बयान से जाहिर हुआ कि वह भी इसे वोट बैंक के नजरिए से देख रही हैं। वर्ग विशेष के वोट पर उनकी नजर है। इसीलिए वह कैराना मसले में समाहित कानून-व्यवस्था के मुद्दे को देखना नहीं चाहती। एक समय था जब मायावती अल्पमत सरकार के दौरान अच्छी कानून-व्यवस्था के लिए जानी जाती थीं। लेकिन बहुमत से जब वह मुख्यमंत्री बनीं तो उनकी वह छवि धूमिल हो गयी। आज कैराना, कांधला पर उनके बयान से साबित हुआ कि वह भी वोट बैंक की उस राजनीति में शामिल हो चुकी हैं, जो कानून-व्यवस्था पर भारी पड़ जाती हैं।

जाहिर है कि कैराना, कांधला को साम्प्रदायिक रूप देने में जद(यू), कम्युनिस्ट पार्टी, माक्र्सवादी- कम्युनिस्ट पार्टी, राष्ट्रवादी कांग्रेस, राजद, सपा, बसपा, कांग्रेस सभी शामिल हैं। जबकि हुकुम सिंह की रिपोर्ट में भले ही कमी हो, लेकिन उन्होंने पहली रिपोर्ट के समय ही कहा था कि यह मामला कानून व्यवस्था से जुड़ा है, यह साम्प्रदायिक मसला नहीं है। बाद में सभी पार्टियों ने इसे साम्प्रदायिक रूप दिया। ऐसे में विचार का मुद्दा यह है कि जब हुकुम सिंह ने कैराना को कानून व्यवस्था से जुड़ा मसला कहा था तो इसे धर्मनिरपेक्षता की दावेदार पार्टियों ने साम्प्रदायिक क्यों बना दिया। क्यों यहां सर्वेक्षण के नाम से बयानबाजी की गयी।

क्या कानून व्यवस्था के आधार पर कैराना और कांधला पर विचार-विमर्श नहीं किया जा सकता था। यह साफ है कि केवल भाजपा के प्रतिनिधिमण्डल ने यहां से तर्कपूर्ण निष्कर्ष निकाले हैं। जिन पर सरकार को ध्यान देना चाहिए। यह जनसंख्या रिपोर्ट से जाहिर है कि यहां हिन्दुओं की आबादी चौंतीस से घटकर आठ प्रतिशत रह गयी है। यदि हुकुम सिंह की सूची पर, जिला प्रशासन के सत्यापन पर विश्वास करें, तब भी मानना होगा कि तीन परिवारों ने रंगदारी के डर से पलायन किया। इसका निहितार्थ मनोवैज्ञानिक और प्रशासनिक ढंग से समझना होगा। यह संभव नहीं कि दबंगों ने मात्र तीन परिवारों से रंगदारी मांगी और वह पलायन कर गए। इसके बाद माहौल सामान्य हो गया, ऐसा नहीं है। इसका अर्थ है कि दबंगों ने अनेक लोगों से रंगदारी मांगी होगी। अनेक लोगों ने दी होगी। तीन परिवार नहीं दे सके, पलायन कर गए।

मतलब साफ है, सरकारी रिपोर्ट में ही रंगदारी का उल्लेख है। यह समस्या भी वर्षों पुरानी बतायी गयी। वर्षों पहले ऐसी ही रिपोर्ट देने वाले जिला मजिस्ट्रेट का तत्काल ट्रांसफर क्यों किया गया था, यह भी बड़ा प्रश्न है। कानून व्यवस्था से जुड़े प्रश्न यहीं तक सीमित नहीं हैं। राजनीति से ऊपर उठकर इन पर विचार करना होगा। पिछले कुछ वर्षों में कितने हिन्दुओं ने अपनी अचल सम्पत्ति बेची और उन्हें किसने खरीदा, कितने बच्चे, बच्चियों ने बीच में पढ़ाई छोड़ी किस समुदाय के कितने लोगों को हथियारों के लाइसेंस दिये गए, अपराधी, अराजक तत्वों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गयी आदि। ये सभी प्रश्न कानून व्यवस्था से जुड़े हैं।

परस्पर सौहार्द भारत की विशेषता है। लेकिन कई बार वोट बैंक की राजनीति से स्थिति बिगड़ती है। कैराना, कांधला आदि की समस्या कानून व्यवस्था से जुड़ी है। इसी के अनुरूप इस पर विचार होना चहिए।

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