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अटल-नमो दृष्टि का परिणाम-चाबहार समझौता

अटल-नमो दृष्टि का परिणाम-चाबहार समझौता

प्रवीण गुगनानी

इन दिनों अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति व मंचों पर, विशेषत: अमेरिका, चीन, जापान, पाकिस्तान सहित समूचे एशिया में जिस शहर का नाम और जिस परियोजना का नाम बहुचर्चित है वह है चाबहार बंदरगाह परियोजना। चाबहार ईरान के बलूचिस्तान प्रदेश का एक छोटा सा मात्र एक लाख की जनसँख्या वाला बलूची नगर है।

चीन व पाकिस्तान के मध्य हुए ग्वादर बंदरगाह समझौते से लगभग दस वर्ष पूर्व भारतीय प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने खाड़ी स्थित ग्वादर व चाबहार बंदरगाह के सामरिक महत्व को दूरदृष्टि से समझ लिया था व ईरान के साथ चाबहार परियोजना समझौते के प्रारम्भिक दस्तावेजों पर वर्ष 2003 में हस्ताक्षर भी कर दिए थे किन्तु खेद और विडंबना कि बाद की कांग्रेसी मनमोहन सरकार ने दस वर्षों के कार्यकाल में इस ओर ध्यान ही नहीं दिया फलस्वरूप यह योजना कागजों में डंप हो गई। वस्तुत: भारत द्वारा ईरान के साथ सम्बंधों को स्वतंत्रता के बाद ही विकसित करना प्रारंभ कर देना चाहिए था, यदि ऐसा हो जाता तो आज खाड़ी और समूचे एशिया में भारत की स्थिति कुछ और होती। उधर चीन की सामरिक दृष्टि पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह पर गिद्ध की भांति गड़ गई और वह बेहद तेजी से पाकिस्तान के साथ ग्वादर बंदरगाह को विकसित करने में लग गया।

वो तो भला हो नरेंद्र मोदी सरकार का कि उसने आते से अटलबिहारी वाजपेयी के इस अधूरे स्वप्न पर कार्य प्रारंभ कर दिया और इस माह भारत व ईरान ने चाबहार बंदरगाह विकास परियोजना के द्विपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर भी कर दिए हैं। इससे भारत के लिए पाकिस्तान जाए बिना ही समुद्री मार्ग से होते हुए अफगानिस्तान जाने का मार्ग खुल जाएगा। दिल्ली व तेहरान के मध्य हुए इस मित्रता के नए अध्याय को भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी ने लिखा। अब यह बेहद महत्वाकांक्षी व दूरदर्शी परियोजना तेजी से प्रारंभ होकर दिसंबर 2016 तक पूर्ण रूप से तैयार भी हो जायेगी। इस बंदरगाह में भारत प्रेरित विकास से खाड़ी क्षेत्र में भारत की उपस्थिति सुदृढ़ हो जायेगी और ईरान भी एक बड़ी बाजार शक्ति बन कर उभरेगा। चाबहार समझौते से चीन सकते में आ गया है क्योंकि उसे अब खाड़ी में भारत की मजबूत स्थिति का सामना करना पड़ेगा। यह बंदरगाह आर्थिक व सामरिक दृष्टि से भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण है समुद्री मार्ग से होते हुए भारत के व्यापारिक जहाज ईरान में दाखिल हो सकते हैं और इसके जरिये अफगानिस्तान तथा मध्य एशिया तक के बाज़ार भारत के व्यापारियों व निवेशकों के लिए खुल जाएँगे, यह और अधिक महत्वपूर्ण तब हो जाता है जबकि पाकिस्तान ने अब तक सीधे-सीधे भारत के उत्पादों को अफगानिस्तान और उससे आगे जाने नहीं दिया है। दूसरी तरफ, चीन और पाकिस्तान के बीच एक करार किया गया है जिसके अंतर्गत चीन पाकिस्तान के दक्षिणी छोर पर ग्वादर बंदरगाह का निर्माण करेगा और यही चीन का एक बड़ा दांव है जिससे उसे इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी दर्ज करवाने का बड़ा मौका मिल जाएगा और इसी दृष्टि से भारत के लिए चाबहार आवश्यक था। यह समझौता ईरान के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ईरान पर अमेरिका ने प्रतिबंध लगा रखे हैं और ऐसे में भारत ने किसी के भी दबाव में आए बिना ईरान से राष्ट्रहित में समझौता कर दिखाया है, इससे ईरान को अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर मजबूती मिलेगी। उल्लेखनीय है कि अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद भी भारत द्वारा ईरान से सतत तेल खरीदा जाता रहा है।

ईरान के साथ हुए इस चाबहार समझौते से अफगानिस्तान जो कि भारत की दृष्टि से सुरक्षा, आर्थिक व सामरिक महत्व का देश है एवं जिसके पास कोई भी सामुद्रिक सीमा नहीं है उससे भारत का सीधा सम्बंध जुड़ जाएगा। इससे भी बढ़कर यह होगा कि पाकिस्तान पर अफगानिस्तान की निर्भरता समाप्त हो जायेगी जिससे पाकिस्तान बौखला रहा है। भारत के पश्चिमी समुद्र तट से चाबहार की कम दूरी के चलते भारतीय सामग्री कम परिवहन लागत में इस क्षेत्र तक पहुच सकेगी साथ ही मध्य एशिया व हिन्द महासागर के उत्तरी भाग के बाजारों के लिए भारत को एक ट्रांजिट हब भी उपलब्ध हो जाएगा। चीन के प्रभाव वाले पाकिस्तानी बंदरगाह ग्वादर से चाबहार की दूरी मात्र साठ किमी होने से भारत सामरिक स्थितियों में चीन के बराबर खड़ा हो सकेगा व साथ ही ईरान से तेल आयात की परिवहन लागत में पड़तल भी बैठा सकेगा। कराकोरम से कराची तक ईकोनामिक कारीडोर बनाने और ग्वादर बंदरगाह को विकसित कर खाड़ी और दक्षिण एशियाई देशों में अपनी सुदृढ़ भूमिका बढ़ाने की ओर अग्रसर हो गए चीन के लिए यह एक नई चुनौतीपूर्ण स्थिति है!
दक्षिण ईरान के चाबहार बंदरगाह के जरिए भारत, पाकिस्तान को बाईपास कर मध्य एशिया तक पहुंच सकेगा। भारत के कजाखस्तान, तुर्कमेनिस्तान जैसे देशों से मजबूत संबंध हैं। भारत चाहता है कि मध्य एशिया से पाइप लाइन के जरिए तेल और गैस भारत तक आए। लेकिन पाइपलाइन शुल्क और उसकी सुरक्षा को लेकर पाकिस्तान की ओर से भरोसेमंद आश्वासन नहीं मिला है। ऐसे में अगर पाइपलाइन पूरी नहीं हुई तो भी भारत चाबहार तक ईंधन ला सकता है। वहां से आगे जहाजों के जरिए ईंधन भारत पहुंच सकता है। पाकिस्तान को एक बड़ा आकर्षण यह भी रहा है कि मध्य एशिया से भारत जाने वाली प्रत्येक वस्तु पाकिस्तान से होकर गुजरे और उसे राजस्व मिलता रहे अब चाबहार के बाद इस्लामाबाद को यह राजस्व हानि झेलनी होगी।
यद्यपि चाबहार के मार्ग में खतरे अब भी बहुत हैं। ईरान पर कई प्रकार के प्रतिबंध लगाकर बैठा अमेरिकी प्रशासन और सीनेट इस समझौते को अपनी दृष्टि से जांच रहे हैं। इस समझौते से भारत व ईरान को मिल रही वैश्विक व सामरिक दृष्टि से बड़ी बढ़त से खाड़ी में अमेरिका सहित कई देश सतर्क हो गए हैं। भारत - ईरान के इस समझौते से अमेरिका स्वाभाविक ही चिंतित हो गया है। अमेरिकी सीनेट में चाबहार को लेकर सीनेटर व अमेरिकी प्रशासन चिंता व्यक्त कर रहे हैं, प्रश्न कर रहे हैं। अमेरिका को न केवल ईरान पर लगाए गए अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों की चिंता है बल्कि वह इस समझौते से भारत को मिली सामरिक बढ़त से भी सकते में है और इस पूरे मामले को महीन दृष्टि से जांच रहे हैं। भारतीय मूल की अमेरिकी विदेश मंत्रालय की अधिकारी व मध्य एशिया मामलों की प्रभारी सचिव निशा देसाई बिस्वाल ने अमेरिका के ईरान पर लगाए प्रतिबंधों को स्पष्ट किया और कहा कि वे इन प्रतिबंधों के चश्मे से ही चाबहार समझौते की जांच सतत कर रही हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि चाबहार बंदरगाह को विकसित करने में अमेरिका की रूचि भी समय-समय पर प्रदर्शित होती रही है।
पाकिस्तान पर अफगानिस्तान की निर्भरता समाप्त होने से व भारत - ईरान - अफगानिस्तान की दूरी अपेक्षाकृत सर्वाधिक कम होने से पाकिस्तान व चीन का घबराना व चाबहार परियोजना में अड़ंगे लगाना या स्वयं भी इसमें सम्मिलित होने का प्रयास करना स्वाभाविक भी है और वह कर भी रहा है। यही कारण है कि पाकिस्तान स्थित ईरानी राजदूत मेहदी हुनर ने कहा कि भारत व ईरान के मध्य चाबहार समझौता अभी पूर्ण नहीं हुआ है और अभी इसमें और भी देश सम्मिलित हो सकते हैं। और देशों के सम्मिलित होने के द्वार खुले होने की बात पूरी तरह से भारत के हित में नहीं है। तेहरान की तरफ से सफाई दी गई है कि चाबहार को ग्वादर के प्रतिद्वंद्वी के तौर पर विकसित नहीं किया जा रहा है। यद्यपि भारत के पचास करोड़ डालर का निवेश ईरान हेतु एक बड़ा आकर्षण है तथापि इस्लामाबाद व बीजिंग दोनों को संतुलित करने को आतुर ईरान के इस बयान से भारत को चिंतित व चैतन्य हो जाना चाहिए।

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