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अपने ही आतंक से घर में घिरे वामपंथी

अपने ही आतंक से घर में घिरे वामपंथी

अपने ही आतंक से घर में घिरे वामपंथी

विशेष प्रतिनिधि

कुथुपरम्बा (केरल)। केरल के चुनाव देशभर में कौतुहल के नजर से इस बार देखे जा रहे हैं। वामपंथियों का गढ़ माने-जाने वाले दक्षिण के इस छोटे से राज्य में लाल सलाम को पहली बार चुनौती मिल रही है। बेशक भारतीय जनता पार्टी सीटों की संख्या की दृष्टि से कोई बड़ा उलटफेर नहीं कर पाए पर उसने न केवल समूचे राज्य में अपितु देश में वामपंथ के असली चेहरे को उजागर करने में सफलता हासिल की है। कुथुपरम्बा में भाजपा के स्टार प्रचारक सीपीएम की क्रूर हिंसा के शिकार हुए एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ही हैं। वे अपने कृत्रिम पैरों की मदद से जब क्षेत्र में निकलते हैं तो वामपंथियों की जमीन हिलने लगती है।

52 वर्षीय एस. सदानंद केरल के त्रिशूर में एक स्कूल शिक्षक है, 6 फरवरी 1994 को सुबह 8:30 बजे बस द्वारा मत्तन्नुर से अपने घर पेरुन्चेरी के लिए निकले थे। रास्ते में सी.पी.एम. के गुंडों ने बम फेकना शुरू कर दिया और आतंक मचा दिया। उसके बाद एस. सदानंद को घेर लिया और बुरी तरह पिटाई की यह देख आस-पास के लोग उनको बचाने के बजाए भागते हुए नजर आए और दुकानदारों ने अपनी-अपनी दुकानें बंद कर लीं।

"सी.पी.एम. के गुंडों ने उनको पीछे से पकड़ लिया रोड पर लेटाकर घुटने के नीचे के दोनों पैरों को काट कर फेंक दिया।"

इस कृत्य में उनको कोई भी बचाने नहीं आया। इनके पिता एवं भाई सी.पी.एम. समर्थक थे पर सदानंद शुरू से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से ही जुड़े। कन्नूर में सहकार्यवाह के दायित्व का निर्वहन कर रहे थे। इसी वजह से सी.पी.एम. समर्थक उत्तेजित होकर उनके खिलाफ हो गए और सी.पी.एम. द्वारा प्रायोजित घटना ने शारीरिक नुकसान पहुंचाया।




घटना के कुछ महीनों के बाद कृत्रिम पैरों की मदद से स्कूल पहुंचे, परन्तु स्कूल का संचालन करने लायक वे नहीं थे, फिर संगठन ने सदानंद को पुन:स्थापित कराने का प्रयास किया और एक पत्रिका 'जन्मभूमि' का सह संपादक नियुक्त किया। उसके बाद 1999 में त्रिशूर में संघ द्वारा संचालित एक स्कूल में शिक्षक बने। इतनी विपदा सहन करने के बाद भी सदानंद संघ परिवार के साथ सामाजिक कार्य में सक्रिय हैं।

कुथुपरम्बा निर्वाचन क्षेत्र पूर्व में हुई राजनीतिक हत्याएं और उग्र प्रदर्शन की वजह से चर्चा में है। वजह है इस गांव में यदि कोई सी.पी.एम. के खिलाफ कार्य करता है तो वो निश्चित ही घटना का शिकार बन जाता है। अब सदानंद 22 वर्ष बाद कन्नूर लौट चुके हैं, यहां पर भाजपा के लिए अपने कृत्रिम पैरों की सहायता से प्रचार कर रहे हैं और सभी को अपने साथ हुई घटना के बारे में बता रहे हैं, क्षेत्रवासी भी सी.पी.एम. के आतंक से तंग आ चुके हैं और

"सदानंद लगातार प्रचार करने में जुटे हुए हैं। इस वजह से उनके पैरों में कभी -कभी रक्त भी बहने लगता है, परन्तु इसकी चिंता ना करते हुए थोड़ा आराम करने के उपरांत निकल पड़ते है"

सी.पी.एम. के कारनामे को समाज के सामने रखने के लिए सदानंद कहते है संघ कार्य बढ़ रहा है, वामपंथी टूट रहे है ।

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