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डीएम ने कुपोषित बच्चों का करवाया वजन

जालौन। कुठौंद ब्लॉक के गांव डगरू का पुरवा में आजादी के 69 साल बाद भी बिजली नहीं पहुंची। ऐसे में समूचा गांव अंधेरे में डूबा रहता है। गांव के लोग इस युग में भी लालटेन और ढिबरी के सहारे जिंदगी बिता रहे हैं।गांव वालों की दिनचर्या बन गई है कि दिन ढलने के पहले ही सारा कामकाज निपटा लेते हैं। सबसे ज्यादा परेशानी स्कूली बच्चों को होती है, क्योंकि यदि रात हो गई तो उन्हें लालटेन या ढिबरी की धुंधली रोशनी में पढऩा पड़ता है। उधर, ग्रामीणों की पीड़ा यह है कि चुनाव के समय राजनीतिक दलों के नेता बड़़े-बड़े वादे तो करते हैं परंतु बाद में कोई मुड़कर भी नहीं ताकता।


तकरीबन दो हजार की आबादी वाले गंाव डगरू का पुरवा में अधिकांश दलित समुदाय के लोग निवास करते हैं। जिन्होंने आजादी के बाद से आज तक बिजली की रोशनी नहीं देखी है। अब तो हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि बिजली की समस्या के चलते दूसरे गांवों के लोग यहां अपनी बेटी का ब्याह कराने तक से कतराने लगे हैं। इतना ही नहीं जो नाते-रिश्तेदार हैं भी वह भी गांव में आने से कतराते हैं। गांव के बाशिंदे इस बाबत पूछने पर दो टूक जवाब देते हैं कि श्उन्हें उम्मीद ही नहीं है कि अपने जीवन में व गावं में बिजली के दर्शन कर सेकेंगे।श् साथ ही यह भी कहते हैं श्आजादी के बाद सूबे में इतनी सरकारे आईं और चली गईं, पर किसी भी सरकार ने इस गांव की परेशानियों की ओर जरा भी ध्यान नहीं दिया।


गांव के मानसिंह दोहरे, वीर सिंह, भूरेलाल, मनसुख लाल, रामस्वरूप, सुरजीत कहते हैं कि गांव में बिजली पहुंचना तो दूर, खंभे तक नहीं लगाए गए हैं। बिजली न होने से किसानों को फसलों की सिचाईं करने की समस्या झेलनी पड़ती है। सबसे ज्यादा दिक्कत स्कूली बच्चों को होती है, बिजली न होने से उनकी पढ़ाई बाधित हो रही है। रामप्रकाश, तुलाराम, राजेंद्र प्रसाद, सूरज प्रसाद, लल्लू राम कहते हैं कि गांव में बिजली न होने से हाईस्कूल व इंटर की परीक्षा दे रहे छात्र ठीक से अपनी पढ़ाई भी नहीं कर पा रहे हैं। पढ़ाने हाल यह है कि स्कूल से लौटने पर बच्चे सबसे पहले अपना होमवर्क पूरा करते हैं, बाद में कुछ खाते-पीते हैं। इसकी वजह साफ है कि अंधेरा हो जाने पर उन्हें लालटेन या ढिबरी की रोशनी में स्कूल का काम करना पड़ेगा। गंाव के ही हिम्मतराम, बाबूराम, मुकुट सिहं, बाबू जी, करन सिंह का कहना है कि सांसद, विधायक, जिलाधिकारी समेत संबंधित विभाग के अफसरों को कई मर्तबा अवगत कराया गया, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा। अब हालात यह हो गए हैं कि अन्य गांव के लोग अपनी बेटी आदि का भी ब्याह कराने से कतराने लगे हैं। तो वहीं, रिश्तेदार भी आने से कतराते हैं, यदि कोई आ भी जाता है तो अंधेरे होने से पहले निकल लेते हैं।

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