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अपनों के निशाने पर सिंधिया

भोपाल। मध्यप्रदेश कांग्रेस के कद्दावर नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया लगता है अब अपनी ही पार्टी के नेताओं के निशाने पर आ गए हैं। जिस तरह सिंधिया को निशाने पर लिया जा रहा है उससे लग रहा है कि उनकी आगे की राह आसान नहीं है। सिंधिया के प्रबल विरोधियों में केवल एक ही दमदार नाम (दिग्विजय सिंह) हुआ करता था लेकिन लोकसभा के शीतकालीन सत्र के समापन के साथ ही ढेर सारे सांसद और कांग्रेस दिग्गज सिंधिया से नाराज हो गए हैं। सिंधिया पर भाजपा के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली से मिलीभगत का आरोप है।

कहा जा रहा है कि सिंधिया ने नोटबंदी के खिलाफ एकजुट हुए विपक्ष को बिखेर देने की चाल चली जिससे दूसरे विपक्षी दल नाराज हो गए और कांग्रेस अकेली पड़ गई। दरअसल, कांग्रेसी राहुल गांधी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात से नाराज हैं और माना जा रहा है कि इस मुलाकात का विचार भी ज्योतिरादित्य सिंधिया की देन था। सारी व्यवस्थाएं भी उन्हीं ने करवाई थी। इस कदम से विपक्षी एकजुटता और नोटबंदी को लेकर पार्टी लाइन को लगे झटके के मद्देनजर पार्टी की ओर से लिखित तौर पर कांग्रेस हाईकमान से असंतोष जाहिर किया गया है।

बताया जा रहा है कि कई बड़े नेताओं को ऐनवक्त पर इस मुलाकात की जानकारी दी गई और उनसे आने के लिए कहा गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के लिए समय लेने से पहले पार्टी के इन नेताओं को न तो भरोसे में लिया गया और न ही इसकी जानकारी दी गई। अमूमन राहुल गांधी के फैसलों या कुछ कदमों को लेकर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में नाराजगी या असंतोष दिखता रहा है
लेकिन यह पहला मौका है जब पार्टी कुछ युवा नेताओं ने भी असंतोष जाहिर किया है।

सिंधिया और जेटली की मिलीभगत
चर्चा है कि सिंधिया के अलावा इस मुलाकात में वित्त मंत्री अरुण जेटली की भी खासी भूमिका रही है। जिसमें वक्त दिलाने में जेटली ने अहम रोल निभाया। जेटली और सिधिंया के आपसी संबंध भी अच्छे हैं, पार्टी के अंदरखाने इस बात की भी चर्चा है कि सिंधिया के जरिए जेटली ने अपना (सरकार का) मकसद हासिल कर लिया। शीतकालीन सत्र में एकजुट दिखा विपक्ष अंत में बिखर गया और इस बिखराव का ठीकरा कांग्रेस के सिर फोड़ा गया। यही वजह रही कि राष्ट्रपति से मुलाकात के लिए सैद्धांतिक तौर पर साथ होने के बावजूद बसपा, सपा, वामपंथी व एनसीपी जैसे दलों ने ऐन मौके पर कांग्रेस से दूरी बना ली।

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