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ताका - झांकी

ताका - झांकी

नहीं चली साहब के आगे

आखिर निगम वाले साहब की हठधर्मी के आगे उनकी मनमानी का विरोध कर रहे अधीनस्थों के हौंसले पस्त हो गए। बताया जा रहा है कि इसके पीछे कारण साहब का विरोध कर रहे लोगों में फूट पड़ जाना है। अपने रमुआ की मानें तो सभी को अपनी-अपनी चिंता है और कोई भी खुलकर सामने नहीं आना चाहता। अब वहीं करना पड़ रहा है जो साहब चाहते हैं।


जंगल से सभी जाने को तैयार बैठे हैं

एक समय ऐसा था, जब जंगल महकमे के अधिकतर अधिकारी ग्वालियर आने के लिए तिकड़म लगाया करते थे, लेकिन अब पता नहीं ऐसा क्या हुआ है कि जिसे देखो वही यहां से अपना ताबादला चाह रहा है। अपने ग्वालियर रेंज वाले साहब को ही ले लो। वे अपने तबादले के लिए जेब हल्की करने को भी राजी हैं। जंगल से छनकर आ रहीं खबरों पर भरोसा करें तो ज्यादातर अधिकारी महकमे के मुखिया ठाकुर साहब की ठकुराइस से परेशान हैं तो कुछ ऐसे भी हैं, जिनकी अतिरिक्त आय के स्त्रोत बंद हो गए हैं। अपने खबरी की मानें तो खनन माफिया से मिलने वाला माल सीधे ठाकुर साहब के पास पहुंच रहा है। ऐसे में भला यहां कोई क्यों रहना चाहेगा।


तो हो जाती बल्ले-बल्ले

जब भगवान देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है यह कहावत इन दिनों शहर के एक थानेदार पर सटीक बैठ रही है। लेकिन उन्हें किसी की ऐसी नजर लगी कि हाथ आई पूंजी का उन्हें खुलासा करना पड़ा। करोड़ों रुपए का खेल उसने ही ध्वस्त करा दिया जिसने रकम थानेदार साहब को दी थी। थाने में छुटभैया खाकी धारी कह रहे हैं कि साहब ने हमें तो बताया होता तो आज बल्ले-बल्ले हो जाती।

अरविन्द माथुर, दिनेश शर्मा, फूलचन्द मीणा


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