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अधिकारों की सीमा नहीं हो धर्म और लिंगभेद

आजादी के बाद जब से भारतीय संविधान लागू हुआ है। भारत की सीमा में रहने वाले प्रत्येक भारतीय नागरिक को समान अधिकार मिले हैं। हर व्यक्ति को समान रूप से घूमने फिरने, खाने-पीने, सेवा या व्यवसाय के माध्यम से धनोपार्जन करने तथा उसका उपयोग करने, अभिव्यक्ति की आजादी सहित वयस्क होने पर मर्जी एवं सहमति से विवाह करने अपना घर-परिवार बसाने की आजादी है। लेकिन भारत में अधिकारों की संवैधानिक समानता में सांप्रदायिक और धर्म के आधार पर अंतर निश्चित ही संवैधानिक अधिकारों और नियमों को खंडित करने वाला है। भारत में मुसलमानों को जहां बहु विवाह की छूट मिलती है, वहीं मर्जी से वह पत्नी को तीन बार तलाक शब्द बोलकर विवाह विच्छेद भी कर सकता है।

खास बात यह है कि इस तीन बार तलाक शब्द बोलने के बाद वह पत्नी को छोड़ सकता है वहीं वह अन्य महिला से विवाह भी कर सकता है। अब तक की सरकारों ने मुस्लिम वोटों के लिए भारतीय संविधान की एक देश में समान कानून की मंशा को ताक पर रखा। हालांकि मुस्लिम समाज के तीन तलाक संबंधी इस धार्मिक कानून के खिलाफ मुस्लिम समाज की महिलाओं के अधिकारों का वर्षों से गला घोंटा जाता रहा। पीडि़त मुस्लिम महिलाएं इस कानून के खिलाफ समय-समय पर आवाज तो उठाना चाहती थीं, लेकिन सरकारों द्वारा साथ नहीं दिए जाने तथा समाज के विरोध के डर से कदम आगे नहीं बढ़ सके। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बनी देश की सरकार ने देश के प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार तथा समान कानून और कर्तव्यों से जोडऩे की अनूठी पहल की है। सरकार चाहती है कि भारत का प्रत्येक नागरिक चाहे वह महिला हो या पुरुष, वह किसी भी जाति या सम्प्रदाय को हो, समान अधिकारों का हकदार होगा। जाति, धर्म या संप्रदाय के कारण भारतीय संविधान में उल्लेखित अधिनियमों के मायने नहीं बदले जाने चाहिए। सरकार की इसी पवित्र मंशा और सदियों से अन्याय झेल रहीं मुस्लिम महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा की गारंटी देने के उद्देश्य से मोदी सरकार ने मुस्लिम शरीयत के उन कानूनों के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपना विरोध दर्ज कराया है जो भारत में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का खुला उल्लंघन करता है। केन्द्र सरकार की ओर से तीन तलाक, निकाह हलाला और बहुविवाह प्रथा के विरोध में सर्वोच्च न्यायालय में अपना पक्ष रखा है। साथ ही लैंगिक समानता और धर्म निरपेक्षता जैसे आधार पर इन पर पुनर्विचार करने का समर्थन किया है। कानून एवं न्याय मंत्रालय ने अपने हलफनामे में लैंगिक समानता, धर्म निरपेक्षता, अंतर्राष्ट्रीय समझौतों, धार्मिक व्यवहारों, और विभिन्न इस्लामी देशों में वैवाहिक कानून का उल्लेख करते हुए यह बात न्यायालय के समक्ष लाने का प्रयास किया है कि तीन तलाक और बहु विवाह की परंपरा पर शीर्ष न्यायालय को सिरे से फैसला किए जाने की जरूरत है।

सरकार की ओर से यह हलफनामा शायरा बेगम द्वारा उच्चतम न्यायालय में दायर याचिका सहित अन्य याचिकाओं पर सरकार की ओर से जवाब में पेश किया है। मुस्लिम समाज को वोट बैंक न समझकर उसे समान अधिकारों, रोजगार, शिक्षा और कर्तव्यों की पैरवी करने वाली भारत सरकार चाहती है कि देश में धर्म और जाति के आधार पर नहीं बल्कि संविधान के अनुसार सभी को समान अधिकार प्राप्त हों। निश्चित ही पहली बार किसी सरकार ने उन मुस्लिम महिलाओं के दर्द को समझा है जिनके पति द्वारा तीन बार तलाक कह दिए जाने पर उनका पूरा जीवन बर्बाद हो जाता था। इसी प्रकार एक मुस्लिम पुरुष को पांच शादियां करने की छूट से भी मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का दमन हो रहा था। सरकार पूरी तरह आशान्वित है कि भारतीय मुस्लिम समाज निश्चित ही महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता दिखाएगा और सरकार की इस पहल का स्वागत और सहयोग करेगा।

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