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केंद्र की श्रेष्ठ शिक्षा नीति का बुरा हाल

यह व्यथा-कथा मध्यप्रदेश के एक शहर या जिले की नहीं है, देश के हर उस स्थान की है जहां निजी विद्यालय हैं और आरटीई के तहत इन विद्यालयों में बीपीएल परिवारों के बच्चों को एडमिशन दिए गए हैं। सरकार ने अपने प्रभाव में नियम बनाकर गरीब बच्चों के लिए महंगे विद्यालयों में एडमिशन लेने का रास्ता तो प्रशस्त कर दिया किंतु ये गरीब बच्चे अब तक जिस संख्या में इन निजी स्कूल में पढऩे चाहिए थे, उस तुलना में उसके आधे भी यहां नहीं पढ़ रहे हैं। शिक्षा के अधिकार के अंतर्गत प्रवेश लेने के बाद अनुभव यही आ रहा है कि लगातार महंगे विद्यालयों से नाम कटवाकर ज्यादातर छात्र-छात्राएं शासकीय स्कूलों में दाखिला लेने के लिए पहुंच रहे हैं।

इस सब के बीच जो सबसे बड़ा सवाल आज खड़ा हुआ है, वह यही है कि आखिर सरकार ने यह व्यवस्था लागू ही क्यों की? इसका उत्तर यही होगा कि सरकार की इसके पीछे की मंशा यही रही होगी कि देश के उन तमाम बच्चों को भी महंगी शिक्षा मिले, जो योग्य हैं किंतु किन्हीं कारणों से आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं। वस्तुत: कुछ बुनियादी कमियों के बावजूद शिक्षा का अधिकार कानून भारत की शिक्षा नीति के इतिहास में एक बड़ी उपलब्धि है। इसकी जो मौलिक विशेषताएं हैं, वही इसे खास बनाती हैं, मसलन भारतीय संविधान के तहत मौलिक अधिकार के रूप में राज्य द्वारा अनिवार्य एवं मुफ्त बुनियादी शिक्षा प्रदान करने की प्रतिबद्धता हो या संसद द्वारा पारित अधिनियम के रूप में इस अधिकार को सुनिश्चित करने वाला कानून, जो इसके उल्लंघन को कानूनी चुनौती देने का आधार मुहैया कराता है। इस कानून का समग्र दृष्टिकोण जिसके तहत बुनियादी ढांचे, शिक्षकों के प्रशिक्षण, हर बच्चे को स्कूल के दायरे में लाना और स्कूल प्रबंधन के लोकतंत्रीकरण व सुधार समेत अन्य प्रावधान सम्मिलित किए गए हैं, इसे विशेष महत्व का बना देते हैं। किंतु इसके बाद भी कहना होगा कि जिस स्तर तक इसे सफल होना चाहिए था, शिक्षा के अधिकार का यह कानून आज तक सफल नहीं हो पाया है।

इसका वर्तमान में जो सबसे बड़ा कारण समझ में आया वह यह है कि आरटीई के तहत प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहे ज्यादातर बीपीएल परिवारों के बच्चे वहां के तामझाम से तालमेल नहीं बैठा पा रहे हैं। शिक्षा के अधिकार के दायरे में आने से प्राइवेट विद्यालयों में दाखिला लेने वाले बच्चों की फीस तो सरकार जमा कर देती है, लेकिन गरीब तबकों के इन बच्चों के लिए महंगी ड्रेस, बार-बार आयोजनों के नाम पर पैसा वसूली, बाहरी आडंबर और महंगी किताबों का बोझ उठा पाना किसी चुनौती से कम नहीं है। इसी चुनौती से दो-चार होते माता-पिता आखिरकार थक-हार कर अपने बच्चों का प्रवेश निजी स्कूल से हटाकर शासकीय विद्यालयों में करने के लिए विवश हो रहे हैं।

जब यह खबर मध्यप्रदेश के खण्डवा जिले से निकलकर आई कि यहां पिछले चार शिक्षा सत्रों में 1490 बच्चों ने प्रवेश लेने के बाद निजी स्कूल छोड़ दिये और वे वापस सरकारी स्कूलों में पहुंच चुके हैं, तब वास्तव में सभी का ध्यान इस ओर गया है। ध्यान में आया कि देश में ऐसा करने वाला खण्डवा अकेला जिला नहीं है, मध्यप्रदेश के इस जिले की जो समस्या है वही देश के अधिकांश राज्यों और जिलों की समस्या है। यहां भी मध्यप्रदेश की तरह बच्चे निजी विद्यालय छोडक़र पलायन कर रहे हैं। जितनी खुशी मां-पिता को इन महंगे स्कूलों में बच्चे का एडमिशन करवाते वक्त होती है, उससे कई गुना ज्यादा दुख उन्हें तब होता है जब वे यहां से अपने बच्चे का नाम सिर्फ इसलिए हटवा रहे होते हैं कि आर्थिक रूप से वे अपने बच्चे को यहां पढ़ाने में असहाय महसूस करते हैं।

बुराई इसमें जरा भी नहीं कि बच्चे क्यों निजी स्कूल छोडक़र सरकारी विद्यालयों में दाखिला ले रहे हैं, पढ़ाई तो सरकारी विद्यालयों में भी होती है, केंद्रीय विद्यालय इसके श्रेष्ठ उदाहरण भी हैं, किंतु सवाल यह है कि सरकार ने यह जो व्यवस्था बनाई थी उसका उद्देश्य कहीं से भी आज पूरा नहीं हो पा रहा है। दूसरी ओर इस हकीकत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि देश में अभी भी 12 लाख नियमित और प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी है जबकि तकरीबन 10 फीसदी स्कूलों में सिर्फ एक शिक्षक है। मानव विकास एवं संसाधन मंत्रालय के आंकड़े यही बता रहे हैं कि 12.6 फीसदी की कमी स्कूल के दायरे से बाहर रह गये बच्चों में देखने को मिली है फिर भी अभी लाखों बच्चे विद्यालय नहीं पहुंच रहे हैं, जिसे हम देश के प्रत्येक बच्चे को शिक्षा मुहैया कराने का वायदा करने वाले शिक्षा के मौलिक अधिकार की आत्मा के खिलाफ मान सकते हैं।

एक तरफ तमाम विरोध के बाद सरकार के नियमों से विवश होकर आरटीई के तहत प्राइवेट स्कूलों को पहली और नर्सरी की 25 फीसदी सीटों पर बीपीएल परिवारों के बच्चों को एडमिशन देना पड़ रहा है, जिनकी फीस सरकार अपनी ओर से जमा करती है। दूसरी ओर यह स्थिति है कि बच्चे यहां की व्यवस्था में अपने को एकाकार नहीं कर पा रहे हैं। अब ऐसे में क्या उपाय किए जाएं कि हालात सुधरें।

वस्तुत: सरकार को यदि शिक्षा के स्तर में समानता रखनी है तो सबसे पहले संपूर्ण देश में एक जैसा पाठ्यक्रम लागू करने पर जोर देना होगा, बोर्ड माध्यम फिर केंद्रीय हो या राज्य स्तरीय पुस्तकों के स्तर में बहुत अंतर नहीं होना चाहिए। इसमें स्थानीय स्तर पर कुछ पाठ अलग हो सकते हैं लेकिन ऐसा न हो कि पूरा का पूरा सिलेबस ही अलग हो । केंद्रीय विद्यालयों में पढऩे वाले बच्चों का पाठ्यक्रम सीमित होता है और ये बच्चे कहीं से भी निजी विद्यालयों के बच्चों से बौद्धिक क्षमता में कम नहीं होते हैं। ऐसे में अनुभव बताता है कि पुस्तकों के अतिरिक्त बोझ से निजी स्कूल्स के बच्चों को दूर रखने के लिए सरकार सख्ती के साथ निपटे। दूसरी ओर निजी स्कूलों में जो तमाम गतिविधियां संचालित होती हैं और इनके नाम से अभिवावकों से पैसा वसूला जाता है, इस पर भी अंकुश लगना चाहिए। जब वहां पढऩे वाले 75 प्रतिशत बच्चों से फीस के अलावा अतिरिक्त पैसा वसूल कर ये विद्यालय अपना काम निकालने में सक्षम हैं तो क्यों वे उन 25 फीसदी सीटों पर जो कि बीपीएल परिवारों के बच्चों से भरी जाती हैं, उन्हें इस अतिरिक्त लिए जाने वाले शुल्क से मुक्त नहीं करते हैं? कई मामलों में यह भी देखने में आया है कि आरटीई के तहत प्रवेश पाने वाले बच्चों से मनमानी फीस न वसूल पाने के मलाल से पीडि़त निजी स्कूलों में इन बच्चों के साथ प्रबंधन का व्यवहार भी बदल जाता है, और वे इन बच्चों को बोझ समझने लगते हैं।

वस्तुत: आज यह अति गंभीर विचारणीय प्रश्न है। जब तक महंगे निजी विद्यालयों में बीपीएल बच्चों के साथ समानता का व्यवहार नहीं किया जाएगा, सरकार लाख कानून बना ले और अपनी ओर से तमाम प्रयास करती रहे, देश में शिक्षा का अधिकार कभी अपनी सफलता के चरम पर नहीं पहुंच सकता है। यह समस्या 21 वीं सदी में क्या आने वाली 22 वीं सदी में भी यथावत बनी रहेगी, बच्चे शिक्षा के अधिकार से महरूम ही रहेंगे।

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