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लोकतंत्र की हत्या के अक्षम्य अपराध का दिन

लोकतंत्र की हत्या के अक्षम्य अपराध का दिन

प्रवीण दुबे



आपातकाल अर्थात लोकतंत्र की हत्या का वह काला दिन जो भुलाए नहीं भूलता यूं तो उस स्याह रात को 40 साल से अधिक का समय गुजर चुका है और वह लोग जिन्होंने उस समय आंख खोली अब प्रौढ़ता की दहलीज को पार कर चुके हैं। लेकिन अभी भी वह पीढ़ी हमारे बीच मौजूद है जिसने आपातकाल की उस विभीषिका को न केवल भोगा बल्कि लोकतंत्र बचा रहे इसके लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था। आज एक बार फिर जब आपातकाल की बरसी है उस समय लोकतंत्र के इन संरक्षकों को सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि आने वाली पीढ़ी को इतिहास की इस सबसे क्रूरतम और तानाशाह पूर्ण घटना की जानकारी ही नहीं है। वह इस बात से भी चिंतित हैं कि जिन्होंने आपातकाल को भोगा वो पीढ़ी भी उसे भूलती सी जा रही है। स्वदेश ने आपातकाल की बरसी पर ऐसे ही कुछ महानुभावों से चर्चा की तो उन्होंने इस दिन को लोकतंत्र की हत्या करने वालों का अक्षम्य अपराध निरुपित करते हुए उस विभीषिका के कड़वे सच को साझा किया। शहर के वरिष्ठ साहित्यकार, शिक्षाविद् और प्रेमचंद सृजन पीठ के अध्यक्ष जगदीश तोमर ने आपातकाल की स्मृतियों को ताजा करते हुए कहा कि आज सबसे बड़ी समस्या यह है कि जिन्होंने आपातकाल को भोगा वही इसे भूलते से नजर आ रहे हैं।

देश में मानव अधिकारों के हनन का इतना बड़ा कदम उठाया गया कि लोकतंत्र की पूरी तरह हत्या ही कर दी गई। इस भयंकर घटना को इस कारण याद रखना जरुरी है क्योंकि नई पीढ़ी इससे प्रेरणा ले सके। एक अन्यायी शासक ने देश को पूरी तरह तबाह कर दिया, मानव अधिकारों पर पाबंदी लगा दी गई, लोकतंत्र की हत्या कर दी गई यह सब कुछ उस तानाशाह, अन्यायी शासक की विकृत मानसिकता का ऐसा अक्षम्य अपराध है जिसे पूरी दुनिया कभी माफ नहीं करेगी। श्री तोमर ने बताया कि सिर्फ स्वयं के अधिकारों के संंरक्षण की खातिर बिना किसी कारण बताए तमाम लोगों को जेल में डाल दिया गया था। वह कहते हैं कि उन्हेंं स्वयं पहले डीआईआर में पकड़ा गया और फिर तुरन्त बाद मीसाबंदी बनाकर केन्द्रीय जेल में ठूंस दिया गया। जेल में तमाम यातना दी गई। श्री तोमर ने कहा कि लोकतंत्र कायम रहे कभी ऐसी स्थिति न बने और अन्याय के प्रति नई पीढ़ी में विरोध का जज्बा पैदा हो इसके लिए यह घटनाक्रम उन्हें बताए जाने की आवश्यकता है।
वरिष्ठ भाजपा नेता और ग्वालियर विकास प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष जगदीश शर्मा भी आपातकाल के दौरान गिरफ्तार किए गए थे। उनकी स्मृतियों में भी यह दिन आज भी ताजा है। चर्चा के दौरान उन्होंने बताया कि उस समय वे छात्र नेता थे और महाराज बाड़ा स्थित इंडियन कॉफी हाउस पर चाय पी रहे थे। उसी दौरान पुलिस आई और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तार करके पहले ग्वालियर के सेंट्रल जेल ले जाया गया और यहां से कुछ दिनों बाद इंदौर जेल भेज दिया गया। जहां कामरेड मोतीलाल शर्मा, छविराम अर्गल सहित ग्वालियर के तमाम लोग जेल में रखे गए। श्री शर्मा बताते हैं कि उसी दिन आदरणीय माधवशंकर इंदापुरकर, प्रो. कप्तान सिंह सोलंकी, श्री अण्णा जी काकिर्डेे जैसे समाजसेवियों को भी पुलिस ने पकड़ कर जेल में ठूंस दिया था। श्री शर्मा ने बताया कि लोकतंत्र की हत्या का ऐसा दिन उन्होंने फिर कभी नहीं देखा। वह कहते हैं कि नई पीढ़ी को इस बात से अवगत कराने और सावधान करने की जरुरत है कि किस प्रकार तानाशाही शक्तियां अपने व्यक्तिगत हितों के लिए लोकतंत्र की हत्या कर सकती हैं। यह दिन भारत के लोकतंत्र पर कलंक जैसा है।
शिक्षाविद् और समाजसेवी प्रो. योगेन्द्र मिश्रा ने चर्चा के दौरान बताया कि आपातकाल लगाने के पीछे पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की तानाशाही पूर्ण मानसिकता मुख्य कारण थी। उन्होंने बताया कि उस समय वे छात्र नेता थे और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संगठन मंत्री का दायित्व उनके पास था। आपातकाल की घोषणा होने के बाद पुलिस ने उन्हें महाराज बाड़े से सत्याग्रह करते समय गिरफ्तार कर लिया था और हुजरात कोतवाली फिर केन्द्रीय जेल में डाल दिया था। आज की युवा पीढ़ी राजनीतिक और सामाजिक रूप से उतनी चेतन नहीं है जितनी कि उसे होना चाहिए। तमाम ऐसे परोक्ष और अपरोक्ष घटनाक्रम होते रहते हैं जिनके बहुत सारे निहितार्थ होते हैं, देश पर कई प्रकार के संकट मंडराते रहते हैं। ऐसी स्थिति में युवा पीढ़ी को आपातकाल जैसी घटनाओं का भान कराना बेहद आवश्यक है ताकि युगों युगों तक हमारा लोकतंत्र सुरक्षित रहे।
पूर्व छात्र नेता रहे और 1973 के जयप्रकाश आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने वाले सर के.पी. सिंह को भी पुलिस ने आपातकाल की काली रात में जेल में डाल दिया था। चर्चा करते हुए के.पी. सिंह बताते हैं कि उस समय वे नौजवान छात्र नेता थे और जयप्रकाश नारायण द्वारा बनाई गई छात्र संघर्ष समिति के प्रदेश महासचिव की जिम्मेदारी उनके पास थी। शरद यादव प्रांत अध्यक्ष थे। आपातकाल की घोषणा होने के बाद उन्हें उस समय संजय कॉम्पलेस स्थित एम.एल.बी. कॉलेज के छात्रावास से रात दो बजे गिरफ्तार कर लिया गया था। तानाशाही का आलम यह था कि सुबह उनका पेपर था और जिस समय पुलिस ने उन्हें पकड़ा वे पढ़ाई कर रहे थे। उन्हें बिना बताए चुपचाप थाने ले जाया गया जहां स्वरूप किशोर सिंघल, डॉ. निवासकर, इंदापुरकर जी, अण्णा जी जैसे वरिष्ठ समाजसेवी पहले से ही पुलिस गिरफ्त में थे। बाद में उन्हें सेंट्रल जेल भेज दिया गया। वास्तव में आपातकाल का इतिहास नौजवान पीढ़ी को जगाने का बहुत बड़ा माध्यम बन सकता है। देश में लोकतंत्र की रक्षा के लिए कितने लोगों ने यातनाएं सहीं यह जानकारी नई पीढ़ी को अवश्य दी जाना चाहिए।
वरिष्ठ भाजपा नेता और लोकतंत्र सेनानी संघ मध्यप्रदेश के उपाध्यक्ष मोहन विटवेकर उन लोगों में शामिल हैं। आपातकाल के समय जिनकी उम्र सबसे कम थी। चर्चा के दौरान श्री विटवेकर ने बताया कि 25 जून को अचानक ही देशभर में राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक संगठनों के लोगों की गिरफ्तारी व उन पर अत्याचार का सिलसिला दो वर्ष तक चला उसमें ग्वालियर इंदिरा गांधी व कांग्रेस के दमन का केन्द्र बना। श्री महीपत राव चिटके, दादा बेलापुरकर, बसंत विटवेकर, माधव शंकर इंदापुरकर, विष्णु दत्त तिवारी, नारायण कृष्ण शेजवलकर जैसे शहर के प्रमुख समाज सेवियों को जेल में डाला गया यह लोग न अपनी गिरफ्तारी के विरुद्ध अपील कर सकते थे न दलील थी और न ही वकील की सुविधा दी गई। वहीं शहर के नौजवान सुबोध गोयल को तानसेन समारोह में मात्र इंदिरा गांधी मुर्दाबाद का नारा लगाने पर पुलिस ने इतना मारा कि वह पागल हो गया। और उसी हालत में उसकी मौत हो गई। स्वयं उन्हें पुलिस हथकड़ी लगाकर परीक्षा देने ले गई। स्व. महावीर प्रसाद जौहरी जो उस समय 70 वर्ष के थे। नरेश जहौरी के धोखे में पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया व गलती समझ में आने पर नसबंदी ऑपरेशन कराने की शर्त पर छोडऩे की बात कही मना करने पर इस वृद्ध को दो वर्ष जेल में रहना पड़ा। हाथ के नाखून उखाडऩा, जबरन स्वमूत्र पिलाना भयानक मारपीट व अंग्रेजी अत्याचार के तरीके जैसी भयंकर यातनाएं आपातकाल में वृद्ध से लेकर नौजवान और बच्चों को दी गई। परन्तु देश की जनता और लोकतंत्र के रक्षक सेनानियों के कड़े संघर्ष के कारण कांग्रेस की चुनाव में बड़ी बुरी तरह पराजय हुई। श्री विटवेकर ने कहा कि लोकतंत्र सेनानी संघ लोकतंत्र पर कोई हमला न हो, लोकतंत्र अमर रहे इसके लिए सतत संघर्षशील व वचनबद्ध है। श्री विटवेकर ने कहा कि नई पीढ़ी को यह इतिहास पढ़ाया जाना चाहिए।
लोकतंत्र सैनानी संघ के महामंत्री मदन बाथम ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि आपातकाल का वह काला अध्याय देश की आने वाली पीड़ी को बताए जाने की आवश्यकता है ताकि आने वाले समय में पुन: कोई तानाशाह ऐसी हरकत न कर सके। श्री बाथम ने बताया कि आज यदि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और सुरक्षित है तो सिर्फ इसलिए कि आपातकाल जैसी विषम परिस्थितियों में भी लोकतंत्र की रक्षा के लिए तमाम लोगों ने संघर्ष किया।

बच्चों ने भी सहा आपातकाल का दंश

आपातकाल की विभीषिका को जहां तमाम सामाजिक राजनैतिक संगठनों से जुड़े समाजसेवियों ने भोगा वहीं लोकतंत्र की रक्षा के इस संघर्ष में छोटे बच्चे भी पीछे नहीं रहे वर्तमान में युवा भाजपा नेता राजेश सोलंकी, विवेक जोशी उस समय छोटे बच्चे थे उन्होंने भी आपातकाल के खिलाफ हुए बाल सत्याग्रह में बढ़चढ़कर भाग लिया था। स्वदेश से बातचीत में उन्होंने बताया कि 1975 में आपातकाल के समय जिन लोगों के पिता या घरवाले जेल में थे ऐसे बच्चों ने यह तय किया कि वे आपातकाल के खिलाफ बाल सत्याग्रह करके इसका प्रतिकार करेंगे। योजना अनुसार लगभग 50 परिवारों से जुड़े बच्चे महाराज बाड़े पर एकत्रित हुए और बाल सत्याग्रह शुरु कर दिया। नारे लगाते हुए यह बच्चे हुजरात कोतवाली तक जा पहुंचे।
उसी दौरान तत्कालीन पुलिस अधीक्षक अयोध्यानाथ पाठक दल बल के साथ वहां पहुंचे और सत्याग्रह कर रहे बच्चों को गिरफ्तार कर लिया। बाद में उन्हें छोड़ा गया। श्री सोलंकी ने बताया कि आपातकाल में उनके पिता प्रो. कप्तान सिंह सोलंकी सहित अन्य बच्चों के परिवारजनों को जेल में डाल दिया गया था। उस समय उन्हें यातनाएं दी गई, परिवार ने भी तमाम कष्टों का सामना किया। श्री सोलंकी, श्री जोशी ने बताया कि वर्तमान पीढ़ी को लोकतंत्र की रक्षा के इस आंदोलन के बारे में बताए जाने की जरुरत है।

लोकतंत्र पर काला धब्बा : प्रो. सोलंकी


प्रसिद्ध शिक्षाविद्, पंजाब व हरियाणा के राज्यपाल व चंडीगढ़ के प्रशासक प्रो कप्तान ङ्क्षसह सोलंकी की स्मृतियों में भी आपातकाल का काला अध्याय पूरी तरह जीवंत है। स्वदेश से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि 25 जून 1975 को देश में आपातकाल लगा उस समय लोकतंत्र को पूरी तरह पटरी से उतार दिया गया। इसके दुखद परिणाम पूरे देश ने भोगे हैं। आपातकाल के खिलाफ जिन लोगों ने आवाज उठाई, उनके लिए यह दिन काला अध्याय बन गया। उनके लिए इसमें न अपील की गुंजाइश थी, न दलील चलती थी, न कोई वकील था। आंतरिक सुरक्षा के नाम पर एक ऐसा काला कानून देश पर थोपा गया जो अंधे कुएं के समान था। बिना सुने बिना जांच और बिना सबूतों के जिसको मन में आया जेल में डाल दिया गया। सड़क पर चलने में भी डर लगने लगा था, लोग अपनों से भी भयभीत थे। (शेष पृष्ठ सात पर...)
जिनके ऊपर सरकार की वक्र दृष्टि थी पूरा समाज उनको शंका की नजर से देख रहा था। सारे थाने कैदियों से नहीं लोकतंत्र के सजग प्रहरियों से पटे पड़े थे। प्रो. सोलंकी बताते हैं कि उनकी गिरफ्तारी उस दिन इस कारण नहीं हुई क्योंकि वे जनता और प्रशासन के बीच ज्यादा प्रसिद्ध नहीं थे, उनके स्थान पर एक अन्य प्राध्यापक कोमल ङ्क्षसह सोलंकी को पुलिस गिरफ्तार करके ले गई। इस कारण से एक माह तक जेल से बाहर रहकर उन्होंने आपातकाल की विभीषिका को देखा। इस काल में राजनीतिक बदले भी लिए गए। आज भी उस काल को जब याद करते हैं, भय आतंक के कारण रूह कांप जाती है। उस कालखंड में संपूर्ण देश लकवा की स्थिति में जा पंहुचा था। राजनीतिक, सामाजिक नेता पकड़े गए तथा जनता पर भी बर्बरता पूर्ण अत्याचार हुए। आपातकाल भारत के लोकतंत्र पर अमिट काला धब्बा जैसा है।

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