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तानसेन समारोह: स्वर लहरियों पर शंकाओं की संगत

तानसेन समारोह: स्वर लहरियों पर शंकाओं की संगत

संस्कृति मंत्री का आश्वासन, और भव्य होगा तानसेन समारोह



प्रवीण दुबे/ग्वालियर। तानसेन समारोह अर्थात शास्त्रीय संगीत का महाकुंभ! भला महाकुंभ की भी कोई अनदेखी करता है, यदि इससे कोई मुंह फेरता है तो इसे महान कलाकार का अपमान कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होना चाहिए।
आखिर ऐसी क्या मजबूरी आ गई कि एक कलाकार की कला को सम्मानित करने हमारे कला एवं संस्कृति मंत्री समय ही नहीं निकाल पाए। अलंकरण समारोह तो हो गया परंतु संगीत प्रेमियों का मन इस महान समारोह के भविष्य को लेकर कई शंकाओं, कुशंकाओं को जन्म दे गया। इस बारे में स्वदेश ने प्रदेश के संस्कृति एवं पर्यटन राज्यमंत्री सुरेन्द्र पटवा से बातचीत की तो उन्होंने कहा कि तानसेन समारोह के प्रति उनके और शासन के मन में पूरा आदर है और आने वाले समय में इस आयोजन को और अधिक भव्यता से करने की योजना है।
तानसेन समारोह को शास्त्रीय संगीत के महाकुंभ की संज्ञा यूं ही नहीं दी जाती, इसके पीछे सबसे महत्वूपर्ण और पहला कारण तो यह है कि यह समारोह उस महान शास्त्रीय गायक की याद में आयोजित होता है, जिसकी राग-रागनियों का तोड़ आज तक दूसरा नहीं है। दूसरा कारण यह है कि ९१ वर्ष के लंबे कालखंड में इस संगीत समारोह में देश के सभी धुरंधर शास्त्रीय संगीत कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियां दी हैं। असगरी बेगम से लेकर लक्ष्मण कृष्णराव पंडित तक और बिस्मिल्लाह खां, अमजद अली से लेकर राजन-साजन मिश्र तक ऐसे अनेक नाम हैं जिनसे तानसेन की समाधि झंकृत होती रही है। महत्वपूर्ण बात यह है कि शास्त्रीय संगीत के यह धुरंधर कलाकार यहां दौलत और नाम के लिए नहीं बल्कि कला को समर्पित महान व्यक्तित्व तानसेन को अपनी स्वरांजलि देने आते रहे हैं। यही वजह रही है कि कला और संस्कृति को सालों से जीवंत करते आ रहे हैं। इस समारोह के महत्व को समझते हुए १९८० में मध्यप्रदेश सरकार ने राष्ट्रीय तानसेन सम्मान की स्थापना की।
अब तक ४७ कलाकारों को यह सम्मान प्रदान किया जा चुका है। इस सम्मान के महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि लंबे समय तक कलाकारों को यह सम्मान प्रदान करने स्वयं प्रदेश के मुख्यमंत्री और उनके साथ कला संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री आते रहे हैं। इतना ही नहीं इस समारोह का दूरदर्शन से सीधा प्रसारण करने की भी परंपरा रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि पिछले कुछ वर्षों में तानसेन समारोह और १९८० से प्रारंभ तानसेन अलंकरण की गौरवशाली परंपरा में कमी आ गई है। इसको लेकर संगीत के रसिकजनों में तरह-तरह की चर्चाएं हैं। आज से प्रारंभ तानसेन समारोह की बात की जाए तो पहले से ही नगरवासी इस बात से दुखी थे कि इसमें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह क्यों नहीं आ रहे
परंतु उन्हें इस बात की प्रसन्नता थी कि चलो प्रदेश के संस्कृति मंत्री तो इसमें आ रहे हैं, लेकिन वह भी नहीं आए। इसको लेकर तमाम रसिकजन परेशान दिखे। कई लोग यह कहते सुने गए कि तानसेन समारोह को कहीं दिल्ली या मुम्बई ले जाने की तैयारी तो नहीं, शायद इसी वजह से संस्कृति मंत्री ग्वालियर नहीं आए और भी चर्चाएं चलती रहीं। देर शाम इन्ही सवालों के साथ स्वदेश ने संस्कृति मंत्री सुरेन्द्र पटवा से दूरभाष पर बात की। श्री पटवा का जवाब था कि तानसेन समारोह की अनदेखी करने जैसी कोई बात संस्कृति मंत्रालय के मन में नहीं है। वह तो इस कारण नहीं आए क्योंकि उनके दांत में संक्रमण हो गया था। श्री पटवा ने कहा कि तानसेन समारोह तो प्रदेश की कला और सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े आयोजनों की श्रेणी में सबसे ऊपर है, उसकी अनदेखी करने का तो सवाल ही नहीं उठता। श्री पटवा ने कहा कि जिन लोगों के मन में यह शंका है कि तानसेन समारोह ग्वालियर से बाहर दिल्ली या मुम्बई ले जाने की तैयारी है तो ऐसा कुछ भी नहीं है। श्री पटवा ने कहा कि हमारी योजना तो इसे और अधिक भव्यता प्रदान करने की है, यही वजह है कि इस वर्ष इसे हमने अन्तर्राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान करने की कोशिश की है। संस्कृति मंत्री ने कहा कि हमारी ग्वालियर में तानसेन समारोह जैसे बड़े संगीत आयोजन करने के लिए एक भव्य संगीत ऑडीटोरियम बनाने की योजना है और इसके लिए जमीन देखी जा रही है। जैसे ही यह प्राप्त होगी काम शुरू कर दिया जाएगा।
प्रदेश के संस्कृति मंत्री सुरेन्द्र पटवा ने बातचीत में तानसेन समारोह की भव्यता को लेकर उठ रही तमाम शंकाओं को विराम दिया और शहरवासियों को इस बात के लिए आश्वस्त भी किया है कि तानसेन समारोह आने वाले समय में और भव्य होगा यदि ऐसा होता है तो यह तानसेन को सच्ची श्रद्धांजलि कही जाएगी।

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