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तिघरा में मगर, देव खो में दुर्लभ चील

तिघरा में मगर, देव खो में दुर्लभ चील

नलकेश्वर व देव खो के जंगल बने दुर्लभ प्रजातियों की शरणस्थली 


दीपक सविता / ग्वालियर।
सर्दियों के मौसम में ग्वालियर के पास स्थित तिघरा एवं देवखो के जंगलों में एक ओर जहां प्रवासी पक्षी बड़ी संख्या में आए हंै वहीं तिघरा के पीछे स्थित नलकेश्वर के जंगल में कई ऐसे पक्षी भी दिखने लगे हैं जिन्हें देखना कुछ साल पहले तक दुर्लभ था। वहीं ग्वालियर के सबसे पंसदीदा पर्यटनस्थल तिघरा जलाशय के पीछे वाले हिस्से में सर्दी के मौसम में पानी के बाहर धूप का आंनद ले रहे करीब एक दर्जन से अधिक मगर भी मिले हैं। इनकी लम्बाई 10 फीट से अधिक है। ग्वालियर में जूलॉजिकल एज्यूकेशन फाउण्डेशन के साथ वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर संजय दत्त शर्मा द्वारा ग्वालियर के पास स्थित जंगलों में प्रवासी पक्षी एवं दुर्लभ व संकटग्रस्त प्रजातियों की जानकारी एकत्रित की जा रही है। शुक्रवार को देवखो एवं तिघरा में कई ऐसे पक्षी देखने को मिले जो कि काफी दुर्लभ हैं और कुछ हजारों मील का सफर कर सर्दियां बिताने के लिए ग्वालियर पहुंचे हंै।

देवखो में आए फ्लेमिंगो

मुख्यरूप से समुद्री क्षेत्रों में पाए जाने वाले फिलेमिंगो इस बार ग्वालियर स्थित तिघरा में भी दिखे हंै यह समुद्र में पाए जाने वाले सेहवाल को खाते हंै। हालांकि यह भारत में गुजरात और महाराष्ट्र के समुद्रतटों पर पाया जाता है, लेकिन इसका तिघरा में पाया जाना आश्चर्य की बात है। फिलेमिंगों की खासियत होती है कि यह समुद्र के खारे पानी में अपनी चोंच डालकर पानी को छानकर सेहवाल को खाते हैं।

तिघरा में दुर्लभ गिद्ध


तिघरा स्थित नलकेश्वर की पहाडिय़ों पर इस बार बेहद दुर्लभ प्रजाति का गिद्ध इंजिप्शियन वल्चर देखने को मिला। पहले यह काफी संख्या में पाए जाते थे लेकिन पशुओं में दूध निकालने से पहले लगाए जाने वाले प्रतिबंधित इंजेक्शन डाईक्लोफेनिक के इस्तेमाल के चलते इनकी बहुत तेजी से मौत होने लगी थी।

दुर्लभ प्रजाति की चील

देवखो के जंगलों में इस बार दुर्लभ प्रजाति की चील भी दिखाई दी है। इनकी एक दूसरी प्रजाति अधिकतर शहरों एवं गांवों में मंडराती दिख जाती है लेकिन यह सिर्फ घने जंगलों में ही पाई जाती है और यह सिर्फ सांप और दूसरे सरीसर्प को ही खाती है। इसकी खुराक में सबसे जहरीले सांपों में शुमार कोबरा भी शामिल है।

मछली पकड़ता मिला किंगफिशर

नीले रंग का किंगफिशर अपने नाम के अनुसार पानी के अंदर गोता लगाकर छोटी मछलियों को पकड़ता हुआ मिला है। यह पानी के अंदर करीब दो फीट गहराई तक गोता लगा सकता है साथ ही यह करीब आधा मिनट तक पानी के अंदर रह सकता है। यह एक ही जगह पर पानी के ऊपर मंडराता रहता है जैसे ही मछली दिखती है तेजी से पानी में गोता लगाकर उसे अपना शिकार बना लेता है।

रूसी पक्षियों का मिला झुण्ड


तिघरा में इस बार रूस और मंगोलिया से आए प्रवासी पक्षी बार हैडेडगुंज के झुण्ड देखने को मिले हैं। यह प्रवासी पक्षी सर्दियां काटने के लिए रूस और मंगोलिया से उड़कर भारत आते हैं। भारत तक की हजारों किलोमीटर यात्रा के दौरान इन पक्षियों को हिमालय की सबसे ऊंची चोटी मांउट एवरेस्ट को भी पार करना पड़ता है। इस पक्षी की खासियत है कि यह हवाई जहाज के बराबर ऊंची उड़ान भरता है। साथ ही एक बार में कई सौ किलोमीटर की दूरी तय करता है।

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