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अनापत्ति के फेर में अटका पुल का निर्माण

ग्वालियर । आजादी के ६५ साल बाद भी मुरैना के उसैद घाट और भिंड के अटेर के बीच स्थित पुल निर्माण का रास्ता साफ होता नहीं दिख रहा है। बुधवार को हुई सुनवाई में शासन ने जवाब प्रस्तुत करते हुए कहा कि पुल का निर्माण इसलिए नहीं हो पा रहा क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित कमेटी व राष्ट्रीय वन्य प्राणी बोर्ड से अनापत्ति पत्र नहीं मिल पाया है। शासन के जवाब से संतुष्ट होकर न्यायालय ने प्रकरण की सुनवाई चार सप्ताह बाद नियत की है। याचिकाकर्ता अधिवक्ता अवधेश सिंह भदौरिया ने न्यायालय को बताया कि आजादी के ६५ साल बाद भी मुरैना के उसैद घाट और भिंड के अटेर के बीच स्थित पुल का निर्माण नही हो पाया जिसके चलते यहां से गुजरने के लिए नाव व स्टीमर का सहारा लेना पड़ता है । उन्होंने बताया कि लोग नावों पर वाहन रखकर इस पार से उस पार ले जाते हैं जबकि उत्तर प्रदेश व मध्यप्रदेश के लोग खासी तादाद में यहां से गुजरते हैं। उन्होंने बताया कि पुल के निर्माण को आवश्यक मानते हुए वर्ष १९८९ में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने पुल बनाए जाने की घोषणा की थी। राज्य सरकार ने पुल निर्माण के लिए २८ करोड़ रुपए की राशि आवंटित भी कर दी। साथ ही राज्य के लोक निर्माण विभाग ने केंद्रीय वन उपमहानिरीक्षक को पत्र लिखकर राष्ट्रीय वन्य जीव बोर्ड की बैठक में इस प्रस्ताव को रखकर पारित कराने की अपील भी की थी लेकिन वन्य जीव बोर्ड ने यह मामला लटका कर रखा हुआ है। वहीं शासन का पक्ष रखते हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता एमपीएस रघुवंशी ने बताया कि पुल निर्माण के लिए 38 करोड़ की राशि स्वीकृत की गई थी साथ ही सड़क निर्माण के लिए निविदाएं भी आमंत्रित की गई थी लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित कमेटी व राष्ट्रीय वन्य प्राणी बोर्ड से अनापत्ति पत्र न मिलने के चलते निविदा निरस्त कर दी गई।

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