Home > Archived > तांबे के बर्तनों से कम होता है संक्रमण

तांबे के बर्तनों से कम होता है संक्रमण

नई दिल्ली। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में एक पुरानी कहावत है जिसका अर्थ है कि जो व्यक्ति तांबे के बर्तन में पानी पीता है, उसका पेट साफ रहता है और उसे कोई संक्रमण नहीं होता है। इसे दादी मां का नुस्खा भी कहा जाता है। लेकिन अब इस दादी मां के नुस्खे को शोधकर्ताओं ने मान्यता दी है। ब्रिटेन के वैज्ञानिक एवं शोधकर्ता प्रोण्बिल केविल ने कॉपर यानी तांबे को संक्रमण से निपटने के लिए एक प्रभावी उपाय बताया है। इसके हुए क्लीनिकल टायल के हवाले से उन्होंने बताया कि कॉपर की सतह पर संक्रमण को 90 फीसदी तक कम किया जा सकता है। संक्रमण से बचाव के लिए ब्रिटेन के बर्मिघम स्थित एक अस्पताल सैली ओक अस्पताल में ताबें की सतह पर क्लीनिकल ट्रायल किया गया। इसके परिणाम को अस्पताल के जर्नल में भी प्रकाशित किया गया। प्रो. बिल केबिल ब्रिटेन के साउथैंपटन विवि में माइक्रोबायलॉजी विभाग के अध्यक्ष हैं। वातावरण में हर जगह जीवाणु एवं रोगाणु मौजूद हैं। अस्पताल, घर के दरवाजे, फर्नीचर, वाटर टैप्स, बिजली के स्वीच, शौचालय समेत हर जगह बैक्टि-या एवं वायरस मौजूद रहते हैं। कहीं भी कोई भी गंभीर संक्रमण का शिकार हो सकता है। इन स्थानों पर यदि तांबे की बनी चीजें रखी जाए तो वहां काफी हद तक संक्रमण को कम किया जा सकता है। अस्पताल में ज्यादातर छूने वाली जगहों पर एंबुलेंस, जीम, स्कूलएसार्वजनिक भवन एसार्वजनिक वाहन एवं दतरों में संक्रमण का खतरा अधिक होता है। इन जगहों पर तांबे की बनी चीजें इस्तेमाल करने से सं€मण के स्तर को बहुत हद तक कम किया जा सकता है।
तांबे का इस्तेमाल फिलहाल एंटीबायोटिक एजेंट के रुप में भी किया जा रहा है। एंटी पलॉक माउथ वाश के रुप में, टुथपेस्ट में, दवाइयों में इनग्रिडिएंट के रुप में तांबे का इस्तेमाल किया जा रहा है।
प्रो. केबिल के मुताबिक प्रयोगशाला में किए गए प्रयोग में देखा गया है कि ताबें के अयस्क 90 फीसदी तक रोगाणुओं को मार देता है। ताबां मनुष्यों के अलावा जीवाणुओं के खाध्य पदार्थ का एक हिस्सा है। लेकिन तांबे के उच्च डोज बैक्टिया की कोशिकाओं में नेगेटिव ऑयन की एक सीरीज पैदा करता है, जिससे बैक्टिया मर जाता है।



Share it
Top